كان قرار الرئيس الأمريكي دونالد ترامب تعيين صاحب فندق ثري سفيرا لواشنطن لدى الاتحاد الأوروبي صعبا.
وتتركز الأنظار حاليا على السفير غوردون سوندلاند في التحقيقات التي قد تنتهي بإجراء محاكمة برلمانية بهدف عزل ترامب.
وتسعى التحقيقات إلى تحديد ما إذا كان ترامب قد حاول الضغط على أوكرانيا لتشويه سمعة منافسه المحتمل في الانتخابات عام 2020، جو بايدن.
وتصدّر سونلاند عناوين الصحف بعد أن غيّر شهادته فجأة أمام الكونغرس، وألمح إلى أن ترامب قد ارتكب جريمة كبيرة على الأرجح.
وكان سوندلاند شخصية غير معروفة حتى الإدلاء بشهادته في الخامس من نوفمبر/تشرين الثاني.
قال أحد الدبلوماسيين في مجلس الاتحاد الأوروبي، طلب عدم الكشف عن هويته، إن لديه "طريقة تنفّر الناس منه". وقال آخر إنه ليس من النوع الذي "يروق للجميع".
وتُطرح أسئلة حول اعتراف سوندلاند بأن الرئيس ترامب كلّفه "بمهمة خاصة" في أوكرانيا، على الرغم من حقيقة أن أوكرانيا ليست في الاتحاد الأوروبي.
وكان سوندلاند قد قدم لمحة عن حياته الشخصية قبل عام من خلال فيديو "تعريفي" نشرته السفارة الأمريكية في بروكسل على موقع يوتيوب.
كان السفير يجلس على أريكة مع زوجته التي تبلغ من العمر 25 عاما، ويتحدث عن عائلته وجذوره الأوروبية المهاجرة وحبه للطيران كطيار متدرب ومجموعته الفنية الواسعة. ويقدم الفيديو صورة مريحة ومنفتحة عن عائلة ثرية تتطلع إلى الحياة في أوروبا.
وتمثيل سونلاند، وهو السفير الأمريكي رقم 20 لدى الاتحاد الأوروبي، لواشنطن في بروكسل هو أول منصب خارجي له، وأول ظهور سياسي له أيضا.
وتتشابه خلفيته مع خلفية الرئيس الذي اختاره. فهو مليونير صاحب فندق ورجل أعمال وضع أنظاره على السياسة.
كان سوندلاند قد دعم في الأصل جيب بوش، منافس ترامب في سباق الرئاسة 2016. وقال في ذلك الوقت، إن ترامب كان بعيدا عن قناعاته الشخصية "على عدة مستويات".
بيد أنه عندما انتُخب ترامب رئيسا للبلاد، تبرع سوندلاند بمبلغ مليون دولار للجنة التي تولت ترتيب مراسم تنصيب الرئيس المنتخب. وبعدها بفترة وجيزة أصبح سفيرا في بروكسل.
وكان قد قال لمراسل أوكراني في وقت سابق من العام الجاري: "نحن ما يطلق عليهم الأصدقاء الثلاثة، والأصدقاء الثلاثة هم (وزير الطاقة) (ريك) بيري، والسفير (كورت) فولكر وأنا، كُلفنا بمهمة إشراف على العلاقة بين الولايات المتحدة وأوكرانيا، وإجراء اتصالات على أعلى المستويات بين الحكومة الأمريكية والحكومة الأوكرانية."
وأصبح هذا الدور، منذ ذلك الوقت، موضع تساؤل أنتوني غاردنر، سفير الولايات المتحدة السابق لدى الاتحاد الأوروبي، الذي وصفه بأنه "غير عادي للغاية"، لأنه لا يمت بصلة مباشرة بالاتحاد الأوروبي.
ووصف سوندلاند الدور بأنه "مهمة خاصة". وقد وضعه دوره في أوكرانيا في دائرة الضوء كشاهد رئيسي في التحقيقات الرامية إلى عزل ترامب.
في الخامس من نوفمبر/تشرين الثاني، غيّر سوندلاند شهادته أمام الكونغرس فجأة. وقال إنه يتذكر الآن إخبار أحد كبار المستشارين للرئيس الأوكراني، فولوديمير زيلينسكي، بأنه لن يُفرج عن نحو 400 مليون دولار مساعدات عسكرية لكييف ما لم تعلن الحكومة الأوكرانية عن إجراء تحقيق، وهو ما أراده الرئيس ترامب، في التعاملات التجارية لهانتر، نجل جو بايدن، والذي يرأس إحدى شركات الطاقة الأوكرانية.
وكان سوندلاند قد نفى في وقت سابق مقايضة أوكرانيا.
وتضيف الشهادة مصداقية إلى الاتهام الرئيسي الموجه للرئيس ترامب بأنه أساء استغلال سلطاته الرئاسية بالضغط على الحكومة الأوكرانية لاتخاذ إجراءات من شأنها أن تساعد حملته للانتخابات الرئاسية عام 2020، وهي اتهامات ينفيها ترامب.
ففي برنامج "ليت شو" لقناة سي بي إس الأمريكية علّق الممثل الكوميدي ستيفن كولبيتر متسائلا: "لماذا قرر سوندلاند مراجعة أقواله أمام الكونغرس؟. ووفقا له، فإن شهادة الإدانة التي أدلى بها شهود آخرون "أنعشت ذاكرته بشأن بعض المحادثات".
وتتفاوت سمعة سوندلاند في بروكسل بين السفراء وكبار المسؤولين في الاتحاد الأوروبي الذين تحدثت إليهم. وتتباين الانطباعات بين كره ظاهري لأسلوبه إلى الإعجاب العلني، وقد وافقوا على التحدث بصراحة، بشرط عدم الكشف عن هويتهم.
وقال أحد كبار الدبلوماسيين في مجلس الاتحاد الأوروبي "إنه يتحدث بنبرة صوت عالية، إن لديه طريقة تنفّر الناس منه".
وأضاف: "من المؤكد أنه خبير في الانعزال، فمعظم السفراء الآخرين في هذا العمل يعرفون الطريقة التي ينجزون بها العمل، ولديهم أرقام هواتف السفراء الآخرين، ويتواصلون بالطريقة التي تجرى بها الأعمال. إنه لم يأت من عالم الدبلوماسية هذا، ولا يعرفه ويبدو أنه لا يريد أن يعرفه أيضا، ولم نر الكثير منه هنا في بروكسل".
Tuesday, November 12, 2019
Thursday, October 31, 2019
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान हिरासत में लिए गए कई आदिवासी
सत्ता में आने के बाद 2014 से हर साल प्रधानमंत्री मोदी की सरकार सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाती है. इस वर्ष राष्ट्रीय एकता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात पहुंचे, जहां उन्होंने अपने भाषण में कहा कि हर भारतीय सरदार पटेल की एकता के विचार को महसूस कर सकता है.
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी पर अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "आज, सबसे ऊंची मूर्ति के नीचे हम सरदार की आवाज़ सुन सकते हैं."
प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं खुश हूं कि (मैं) सरदार के सपने को सच कर पाया. सरदार के जन्मदिन पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं."
उन्होंने कहा, "अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को सिर्फ अलगाववाद और आतंकवाद दिया."
मोदी ने कहा, "ये देश में अकेली ऐसी जगह थी जहां अनुच्छेद 370 मौजूद था. जहां पिछले तीस सालों में चालीस हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और आतंकवाद की वजह से कई माओं ने अपने बेटों को खोया. अब 370 की ये दीवार गिर गई है."
"अनुच्छेद 370 के हटने के बाद उनकी आत्मा को शांति मिलेगी. सरदार पटेल ने कश्मीर को भारत में मिलाने का सपना देखा था."
इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि "भारत की एकता पर हमले की हर कोशिश को हम नाकाम कर देंगे."
प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय एकता दिवस की परेड में भी हिस्सा लिया.
दूसरी तरफ जिन लोगों से स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी बनाने के लिए ज़मीनें ली गईं वे प्रदर्शन कर रहे हैं.
ये स्थानीय आदिवासी ज़मीन और रोज़गार के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी राष्ट्रीय एकता दिवस को 'काला दिवस' कह रहे हैं.
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के नज़दीक सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं, जिसकी वजह से वहां प्रदर्शन नहीं हो सके. लेकिन इन लोगों ने गांवों में इकट्ठा होकर प्रदर्शन किए.
आदिवासी लोगों का दावा है कि स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के लिए उनकी ज़मीने ले ली गई, लेकिन उन्हें उचित रोज़गार नहीं दिया गया.
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी पर अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "आज, सबसे ऊंची मूर्ति के नीचे हम सरदार की आवाज़ सुन सकते हैं."
प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं खुश हूं कि (मैं) सरदार के सपने को सच कर पाया. सरदार के जन्मदिन पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं."
उन्होंने कहा, "अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को सिर्फ अलगाववाद और आतंकवाद दिया."
मोदी ने कहा, "ये देश में अकेली ऐसी जगह थी जहां अनुच्छेद 370 मौजूद था. जहां पिछले तीस सालों में चालीस हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई और आतंकवाद की वजह से कई माओं ने अपने बेटों को खोया. अब 370 की ये दीवार गिर गई है."
"अनुच्छेद 370 के हटने के बाद उनकी आत्मा को शांति मिलेगी. सरदार पटेल ने कश्मीर को भारत में मिलाने का सपना देखा था."
इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि "भारत की एकता पर हमले की हर कोशिश को हम नाकाम कर देंगे."
प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय एकता दिवस की परेड में भी हिस्सा लिया.
दूसरी तरफ जिन लोगों से स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी बनाने के लिए ज़मीनें ली गईं वे प्रदर्शन कर रहे हैं.
ये स्थानीय आदिवासी ज़मीन और रोज़गार के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी राष्ट्रीय एकता दिवस को 'काला दिवस' कह रहे हैं.
स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के नज़दीक सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं, जिसकी वजह से वहां प्रदर्शन नहीं हो सके. लेकिन इन लोगों ने गांवों में इकट्ठा होकर प्रदर्शन किए.
आदिवासी लोगों का दावा है कि स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के लिए उनकी ज़मीने ले ली गई, लेकिन उन्हें उचित रोज़गार नहीं दिया गया.
Tuesday, September 17, 2019
Кэмерон: "Джонсон не верил в брексит и поддержал его ради карьеры"
Борис Джонсон не верил в брексит во время кампании по подготовке референдума 2016 года и поддержал евроскептиков только из-за своих политических амбиций, утверждает в своих мемуарах бывший премьер-министр Британии Дэвид Кэмерон.
В опубликованных в газете Sunday Times фрагментах новой книги Кэмерон также называет члена кабинета министров Майкла Гоува (отвечающего сейчас за подготовку к брекситу) "оголтелым фараджистом", то есть сторонником Найджела Фараджа - одного из зачинщиков кампании за выход из Евросоюза, бывшего лидера Партии независимости Соединенного королевства (UKIP), а ныне лидера партии "Брексит".
Эта пара, Гоув и Джонсон, превратилась в "послов эпохи популизма, изобилующей враньем и очернением всего", пишет Кэмерон.
Он также обвиняет Гоува в вероломстве, как по отношению к нему самому, так и к Борису Джонсону.
"Одно его качество проявилось ярче всех прочих: вероломство. Вероломство по отношению ко мне, а позже и к Борису", - пишет Кэмерон, запустивший во время своего премьерства референдум по вопросу о членстве Британии в Евросоюзе, поскольку это обещание содержалось в предвыборном манифесте Консервативной партии.
Сам Кэмерон активно поддерживал кампанию за сохранение членства и ушел с поста премьер-министра сразу после того, как стали известны результаты плебисцита, на котором 52% проголосовавших высказались за то, чтобы выйти из ЕС, и 48% - за то, чтобы остаться.
Как пишет в мемуарах бывший премьер-министр, когда Джонсон решал, какую кампанию ему поддержать - "Уйти" или "Остаться" - его волновало только то, что будет лучше для его собственной политической карьеры.
"Кто бы из высокопоставленных членов тори ни возглавил сторону за брексит, столь мощно заряженную духом патриотизма, независимости и романтики, тот сразу стал бы партийным любимчиком, - полагает Кэмерон. - Он [Джонсон] не хотел рисковать и дать возможность какому-то другому заметному политику - в частности, Майклу Гоуву - получить эту корону".
В опубликованных в газете Sunday Times фрагментах новой книги Кэмерон также называет члена кабинета министров Майкла Гоува (отвечающего сейчас за подготовку к брекситу) "оголтелым фараджистом", то есть сторонником Найджела Фараджа - одного из зачинщиков кампании за выход из Евросоюза, бывшего лидера Партии независимости Соединенного королевства (UKIP), а ныне лидера партии "Брексит".
Эта пара, Гоув и Джонсон, превратилась в "послов эпохи популизма, изобилующей враньем и очернением всего", пишет Кэмерон.
Он также обвиняет Гоува в вероломстве, как по отношению к нему самому, так и к Борису Джонсону.
"Одно его качество проявилось ярче всех прочих: вероломство. Вероломство по отношению ко мне, а позже и к Борису", - пишет Кэмерон, запустивший во время своего премьерства референдум по вопросу о членстве Британии в Евросоюзе, поскольку это обещание содержалось в предвыборном манифесте Консервативной партии.
Сам Кэмерон активно поддерживал кампанию за сохранение членства и ушел с поста премьер-министра сразу после того, как стали известны результаты плебисцита, на котором 52% проголосовавших высказались за то, чтобы выйти из ЕС, и 48% - за то, чтобы остаться.
Как пишет в мемуарах бывший премьер-министр, когда Джонсон решал, какую кампанию ему поддержать - "Уйти" или "Остаться" - его волновало только то, что будет лучше для его собственной политической карьеры.
"Кто бы из высокопоставленных членов тори ни возглавил сторону за брексит, столь мощно заряженную духом патриотизма, независимости и романтики, тот сразу стал бы партийным любимчиком, - полагает Кэмерон. - Он [Джонсон] не хотел рисковать и дать возможность какому-то другому заметному политику - в частности, Майклу Гоуву - получить эту корону".
Wednesday, August 28, 2019
"Это розыгрыш, выходи за меня!": зачем в России невестам подбрасывают наркотики
В России уже несколько лет существует бизнес экстремальных предложений руки и сердца. Корреспондент Би-би-си побывала на такой помолвке и обсудила с женихом, невестой, организаторами и учеными, зачем это нужно.
В августе 2019 года Анастасия Карамзина (фамилия изменена по просьбе девушки) летела из родного Барнаула в Петербург. В аэропорту ее должен был встречать ее возлюбленный Сергей Уржанов (фамилия также изменена), молодой сотрудник одного из российских силовых ведомств. Однако с утра Уржанов прислал девушке сообщение, что его срочно вызвали к начальству и ее встретит их общий друг.
Машина благополучно подъехала к дому в Невском районе Петербурга, где Анастасия с Сергеем снимают однокомнатную квартиру. Однако прямо перед поворотом во двор путь автомобилю резко перегородил микроавтобус с тонированными стеклами.
Из микроавтобуса выбежали вооруженные люди в масках и черной спецназовской форме, вытащили из машины водителя, а саму Анастасию отвели в сторону. Затем они открыли багажник, начали досматривать вещи девушки и в маленьком черном чемодане обнаружили полиэтиленовый сверток с белым порошком.
- Вы подозреваетесь в незаконной перевозке, в покушении на незаконный сбыт наркотических веществ в крупном размере.
Анастасия, белокурая красавица в персиковом платье с воланами, растерянно улыбается и еле слышно говорит:
Один из спецназовцев внезапно бухается на одно колено, стягивает чулок с лица и оказывается бойфрендом Анастасии Сергеем. "Выходи за меня!" - выдыхает он.
Спецназовцы ненастоящие: Сергей Уржанов хотел сделать своей девушке предложение и нанял специальное агентство, устраивающее "шоу в стиле спецназ".
Стоимость заказа начинается от 700 рублей - столько просят за получасовую фотосессию с одним бойцом в Набережных Челнах. Выезд целой группы, когда заказчик хочет сымитировать спецоперацию (например, на чьем-то дне рождения) или облаву в офисе, в регионах стоит около 10 тысяч рублей, а в Петербурге, по словам создателя "Спецназ шоу" Сергея Родкина, в среднем от 30 до 60 тысяч. Верхней границы не существует: "Можно и на сто тысяч придумать, хоть на вертолете прилететь, хоть БТР привезти".
36-летний Родкин рассказывает, что придумал такой формат заработка в 2010 году: "Сначала бесплатно баловались, к друзьям прибегали на свадьбы. Постепенно уровень вырос, через годик уже стали деньги брать". В 2015 году он зарегистрировал товарный знак "Спецназ шоу" и стал отдавать франшизу в регионы. Сейчас у компании 14 филиалов по стране. Пару лет назад "Спецназ шоу" открылось даже в Крыму.
Первое предложение руки и сердца в формате спецоперации агентство устроило в 2014-м. Заказчиком стал Дмитрий Черных, предприниматель из Петербурга - по его словам, он был соавтором идеи. Как вспоминает Черных, мысль пришла спонтанно: "Не подсмотрено, не подслушано, сам придумал". Сейчас у мужчины собственный бизнес по производству торгового оборудования, а тогда он занимался промоушеном в ночных клубах и был знаком с Родкиным как с организатором мероприятий.
В августе 2019 года Анастасия Карамзина (фамилия изменена по просьбе девушки) летела из родного Барнаула в Петербург. В аэропорту ее должен был встречать ее возлюбленный Сергей Уржанов (фамилия также изменена), молодой сотрудник одного из российских силовых ведомств. Однако с утра Уржанов прислал девушке сообщение, что его срочно вызвали к начальству и ее встретит их общий друг.
Машина благополучно подъехала к дому в Невском районе Петербурга, где Анастасия с Сергеем снимают однокомнатную квартиру. Однако прямо перед поворотом во двор путь автомобилю резко перегородил микроавтобус с тонированными стеклами.
Из микроавтобуса выбежали вооруженные люди в масках и черной спецназовской форме, вытащили из машины водителя, а саму Анастасию отвели в сторону. Затем они открыли багажник, начали досматривать вещи девушки и в маленьком черном чемодане обнаружили полиэтиленовый сверток с белым порошком.
- Вы подозреваетесь в незаконной перевозке, в покушении на незаконный сбыт наркотических веществ в крупном размере.
Анастасия, белокурая красавица в персиковом платье с воланами, растерянно улыбается и еле слышно говорит:
Один из спецназовцев внезапно бухается на одно колено, стягивает чулок с лица и оказывается бойфрендом Анастасии Сергеем. "Выходи за меня!" - выдыхает он.
Спецназовцы ненастоящие: Сергей Уржанов хотел сделать своей девушке предложение и нанял специальное агентство, устраивающее "шоу в стиле спецназ".
Стоимость заказа начинается от 700 рублей - столько просят за получасовую фотосессию с одним бойцом в Набережных Челнах. Выезд целой группы, когда заказчик хочет сымитировать спецоперацию (например, на чьем-то дне рождения) или облаву в офисе, в регионах стоит около 10 тысяч рублей, а в Петербурге, по словам создателя "Спецназ шоу" Сергея Родкина, в среднем от 30 до 60 тысяч. Верхней границы не существует: "Можно и на сто тысяч придумать, хоть на вертолете прилететь, хоть БТР привезти".
36-летний Родкин рассказывает, что придумал такой формат заработка в 2010 году: "Сначала бесплатно баловались, к друзьям прибегали на свадьбы. Постепенно уровень вырос, через годик уже стали деньги брать". В 2015 году он зарегистрировал товарный знак "Спецназ шоу" и стал отдавать франшизу в регионы. Сейчас у компании 14 филиалов по стране. Пару лет назад "Спецназ шоу" открылось даже в Крыму.
Первое предложение руки и сердца в формате спецоперации агентство устроило в 2014-м. Заказчиком стал Дмитрий Черных, предприниматель из Петербурга - по его словам, он был соавтором идеи. Как вспоминает Черных, мысль пришла спонтанно: "Не подсмотрено, не подслушано, сам придумал". Сейчас у мужчины собственный бизнес по производству торгового оборудования, а тогда он занимался промоушеном в ночных клубах и был знаком с Родкиным как с организатором мероприятий.
Tuesday, August 20, 2019
克什米尔危机:中国在UN支持讨论但莫迪坚持“印度梦”
印度总理莫迪说,废除印控克什米尔特殊自治的地位决定将使该地区恢复“过去的荣耀”。从印度内政看,莫迪为何会做出这样的决定呢?
此前,中国已经在联合国支持巴基斯坦提出的要求,请求联合国安理会紧急讨论印度撤销查谟和克什米尔特殊地位的决定。但中巴此举受到法国的反对。
法国回应表示,建议安理会在下周以非正式的方式讨论这一问题。2019年8月,安理会轮值主席国波兰将在15个成员国之间磋商,商定一个时间和形式进行调解。
印度总理莫迪在8月15日印度独立日讲话中表示,克什米尔将在印度的发展中发挥重要作用。
他表示,过去赋予克什米尔特殊地位的印度宪法第370条只会鼓励腐败。
但莫迪没有提及一个多星期以来印度在克什米尔实行的全面戒严和通讯封锁。印控克什米尔自治地位被废除后,印度人可以不再受过去法律限制购买当地资产或移民当地。
巴基斯坦对印度废除印控克什米尔地位的决定做出了强烈反应。巴基斯坦总理伊姆兰·汗警告称,印度的决定可能导致两国爆发全面武装冲突。巴方驱逐了印度驻巴高专(大使),并宣布不再派出驻印度高专(大使)。中断两国双边贸易和重要的铁路交通。
随着印巴双方在克什米尔实际控制线两边的军事对峙态势更加严峻,联合国秘书长古特雷斯发表声明对克什米尔局势的变化保持关注,同时呼吁印度和巴基斯坦保持最大限度的克制。
在印度德里的观察家研究基金会的资深研究员阿肖克·马利克认为,印度各地对克什米尔问题的看法更加强硬,也造成了一种允许采取这种行动的气氛。
他表示,在印度2016年7月镇压克什米尔当地反叛乱行动中,当地武装组织的好战领导人布尔汉·瓦尼被印度军警击毙。
他认为,瓦尼之死和随后的暴力活动是克什米尔动乱的新阶段,对自由的呼声被伊斯兰圣战的呼声淹没了。因此,马利克认为,印控克什米尔的主要呼声已经不再是要求建立独立的克什米尔,甚至不是要求与巴基斯坦合并,而是伊斯兰极端主义者要求建立一个原教旨主义哈里发国家。
他说,2016 年的事件在印度国内产生了另一个影响,激进左翼团体在印度各地校园、媒体辩论和公共平台上就克什米尔问题发动了针对莫迪总理的抨击。这最终导致印度民意反弹。
上述观点与其它很多有关克什米尔问题的观点不同。很多观察人士认为,印度取消印控克什米尔自治地位起源于印度民族主义者的呼吁,而莫迪政府在赢得大选连任后顺应民粹主义要求,以反恐为名做出了改变历史现状的举动。
此前,中国已经在联合国支持巴基斯坦提出的要求,请求联合国安理会紧急讨论印度撤销查谟和克什米尔特殊地位的决定。但中巴此举受到法国的反对。
法国回应表示,建议安理会在下周以非正式的方式讨论这一问题。2019年8月,安理会轮值主席国波兰将在15个成员国之间磋商,商定一个时间和形式进行调解。
印度总理莫迪在8月15日印度独立日讲话中表示,克什米尔将在印度的发展中发挥重要作用。
他表示,过去赋予克什米尔特殊地位的印度宪法第370条只会鼓励腐败。
但莫迪没有提及一个多星期以来印度在克什米尔实行的全面戒严和通讯封锁。印控克什米尔自治地位被废除后,印度人可以不再受过去法律限制购买当地资产或移民当地。
巴基斯坦对印度废除印控克什米尔地位的决定做出了强烈反应。巴基斯坦总理伊姆兰·汗警告称,印度的决定可能导致两国爆发全面武装冲突。巴方驱逐了印度驻巴高专(大使),并宣布不再派出驻印度高专(大使)。中断两国双边贸易和重要的铁路交通。
随着印巴双方在克什米尔实际控制线两边的军事对峙态势更加严峻,联合国秘书长古特雷斯发表声明对克什米尔局势的变化保持关注,同时呼吁印度和巴基斯坦保持最大限度的克制。
在印度德里的观察家研究基金会的资深研究员阿肖克·马利克认为,印度各地对克什米尔问题的看法更加强硬,也造成了一种允许采取这种行动的气氛。
他表示,在印度2016年7月镇压克什米尔当地反叛乱行动中,当地武装组织的好战领导人布尔汉·瓦尼被印度军警击毙。
他认为,瓦尼之死和随后的暴力活动是克什米尔动乱的新阶段,对自由的呼声被伊斯兰圣战的呼声淹没了。因此,马利克认为,印控克什米尔的主要呼声已经不再是要求建立独立的克什米尔,甚至不是要求与巴基斯坦合并,而是伊斯兰极端主义者要求建立一个原教旨主义哈里发国家。
他说,2016 年的事件在印度国内产生了另一个影响,激进左翼团体在印度各地校园、媒体辩论和公共平台上就克什米尔问题发动了针对莫迪总理的抨击。这最终导致印度民意反弹。
上述观点与其它很多有关克什米尔问题的观点不同。很多观察人士认为,印度取消印控克什米尔自治地位起源于印度民族主义者的呼吁,而莫迪政府在赢得大选连任后顺应民粹主义要求,以反恐为名做出了改变历史现状的举动。
Wednesday, July 31, 2019
美国前驻港总领事:北京应在对港事务上“退一步”
美国前驻香港总领事唐伟康(Kurt Tong)表示,美国对港政策应持续在《香港政策法》框架内运作,但华盛顿应更积极与香港接触,不要把香港看作次要议题。同时,他建议北京政府在香港民怨沸腾的情况下,应在对港事务上“退一步”,给予香港更多空间。
唐伟康在30日(周二)的华府智库研讨会建议,中共在对港事务上要冷静后退,在北京和香港之间创造更多空间。"我知道我作为外国人(提这个建议),中国人会对此有负面反应。但我认为这是正确的建议。"
在唐伟康的演讲前数小时,中国外交部发言人华春莹称,香港的“暴力活动”是美方“作品”,敦促美国国务卿蓬佩奥“摆正自己的位置”。
作为前美国驻香港最高层级的外交官,唐伟康建议美国及其他外国政府,积极增加与香港的接触,坦诚直率地发表对港看法,不要轻描淡写;然而同时,不要因香港是涉及中国的议题,而夸大香港面临的情况。"不成比例的批评并起不到作用,"唐伟康说。
他认为,就目前而言,如果美国对港政策偏离《美国—香港政策法》的框架是不明智的举动。《香港政策法》载明,如果香港不再享有足够自治,美国政府将重新考虑是否给予香港特殊待遇。
BBC提问他是否认为香港仍享有“足够自治”,唐伟康引述国务院早前报告称,香港自治仍足够但在下降(sufficient but declining)。他表示,在足够和不足够自治之间划明显界线并不明智。“那应是一个主观判断(judgement call)。”而划出红线将使人们的期待混乱,让注意力集中在何时过界,而不是积极可行的举措。
唐伟康从2016年到2019年7月担任美国驻香港及澳门总领事,在反《逃犯条例》修例运动初期卸任。他转至私营政治风险咨询公司工作,由资深外交官史墨客(Hanscom Smith)接替驻港澳总领事的职务。
唐伟康原定在7月初在华盛顿智库发表演说,但活动在原定日期前一日遭到延迟,被认为与国务院希望避免影响美中贸易谈判有关。根据《金融时报》报导,较早前,唐伟康本计划就香港自治情况发表对北京政府的严厉批评,但被美国国务院要求放低声浪。
回应BBC相关询问时,唐伟康称,智库演讲因要通过国务院的审查与官僚程序而改期,在记者的追问下,他仍然没有松口透露,是否因习特会与贸易谈判而延迟举行。“事情不总按计划进行,”他回答。
但唐伟康在演讲中多次暗示,特朗普政府重视达成交易而非价值观。他称,特朗普政府倾向于将美中贸易等首要目标放于优先位置,而把香港等议题列为次要议题。他呼吁,对外政策不应只是关于交易,美国政府应坚持原则性价值观。“我近来担心,我们侧重指出美国不喜欢的东西,而没有强调定义‘我们是什么’。”
唐伟康对香港政府的忠告是,重新认识香港人民与香港作为“亚洲国际都市”的个性。他以在香港存在本地、内地、外国资本为例阐述,它们都十分重要且互相吸引。“如果没有外国资本,内地资本不会流入香港,如果香港失去内地资本,外币流入香港的兴趣也会下降。”
唐伟康认为,中国内地经济崛起,并不代表香港的经济地位被取代,反而,这意味着香港的地位越发重要,世界第三大金融中心的地位屹立不倒。超过一半的外国对中国投资,依然通过香港流入,现时有1600家美国企业在香港设有办事处。"这是由于香港的法律架构,及可靠的司法体制,"唐伟康说。
唐伟康在30日(周二)的华府智库研讨会建议,中共在对港事务上要冷静后退,在北京和香港之间创造更多空间。"我知道我作为外国人(提这个建议),中国人会对此有负面反应。但我认为这是正确的建议。"
在唐伟康的演讲前数小时,中国外交部发言人华春莹称,香港的“暴力活动”是美方“作品”,敦促美国国务卿蓬佩奥“摆正自己的位置”。
作为前美国驻香港最高层级的外交官,唐伟康建议美国及其他外国政府,积极增加与香港的接触,坦诚直率地发表对港看法,不要轻描淡写;然而同时,不要因香港是涉及中国的议题,而夸大香港面临的情况。"不成比例的批评并起不到作用,"唐伟康说。
他认为,就目前而言,如果美国对港政策偏离《美国—香港政策法》的框架是不明智的举动。《香港政策法》载明,如果香港不再享有足够自治,美国政府将重新考虑是否给予香港特殊待遇。
BBC提问他是否认为香港仍享有“足够自治”,唐伟康引述国务院早前报告称,香港自治仍足够但在下降(sufficient but declining)。他表示,在足够和不足够自治之间划明显界线并不明智。“那应是一个主观判断(judgement call)。”而划出红线将使人们的期待混乱,让注意力集中在何时过界,而不是积极可行的举措。
唐伟康从2016年到2019年7月担任美国驻香港及澳门总领事,在反《逃犯条例》修例运动初期卸任。他转至私营政治风险咨询公司工作,由资深外交官史墨客(Hanscom Smith)接替驻港澳总领事的职务。
唐伟康原定在7月初在华盛顿智库发表演说,但活动在原定日期前一日遭到延迟,被认为与国务院希望避免影响美中贸易谈判有关。根据《金融时报》报导,较早前,唐伟康本计划就香港自治情况发表对北京政府的严厉批评,但被美国国务院要求放低声浪。
回应BBC相关询问时,唐伟康称,智库演讲因要通过国务院的审查与官僚程序而改期,在记者的追问下,他仍然没有松口透露,是否因习特会与贸易谈判而延迟举行。“事情不总按计划进行,”他回答。
但唐伟康在演讲中多次暗示,特朗普政府重视达成交易而非价值观。他称,特朗普政府倾向于将美中贸易等首要目标放于优先位置,而把香港等议题列为次要议题。他呼吁,对外政策不应只是关于交易,美国政府应坚持原则性价值观。“我近来担心,我们侧重指出美国不喜欢的东西,而没有强调定义‘我们是什么’。”
唐伟康对香港政府的忠告是,重新认识香港人民与香港作为“亚洲国际都市”的个性。他以在香港存在本地、内地、外国资本为例阐述,它们都十分重要且互相吸引。“如果没有外国资本,内地资本不会流入香港,如果香港失去内地资本,外币流入香港的兴趣也会下降。”
唐伟康认为,中国内地经济崛起,并不代表香港的经济地位被取代,反而,这意味着香港的地位越发重要,世界第三大金融中心的地位屹立不倒。超过一半的外国对中国投资,依然通过香港流入,现时有1600家美国企业在香港设有办事处。"这是由于香港的法律架构,及可靠的司法体制,"唐伟康说。
Wednesday, July 24, 2019
देश का वह राज्य, जहां बिना 'वीजा' के नहीं जा सकते भारत के ही लोग
जम्मू-कश्मीर में तो हालात फिर भी ठीक हैं. वहां देश का कोई भी नागरिक बिना अनुमति के जा सकता है. मगर नागालैंड में तो इनर लाइन परमिट लिए बगैर कोई भारतीय नागरिक घुस भी नहीं सकता. केवल स्थानीय निवासियों को ही बेरोकटोक राज्य में घूमने की छूट है. यह इनर लाइन परमिट एक प्रकार से आंतरिक वीजा जैसा दस्तावेज होता है.
यूं तो इनर लाइन परमिट रूल पहले जम्मू-कश्मीर में भी लागू था, मगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन के बाद वहां परमिट सिस्टम खत्म हो गया. लेकिन, नागालैंड में यह नियम आज भी जारी है. अब यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनने लगा है.
हाल ही में बीजेपी नेता अश्निनी उपाध्याय इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंचे तो वहीं बीते 23 जुलाई को दो सांसदों ने भी लोकसभा में इनर लाइन परमिट सिस्टम के मुद्दे को उठाया. जिस पर सरकार ने कहा है कि भारतीय नागरिकों को अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और दीमापुर को छोड़कर नगालैंड में यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है. दीमापुर के लिए इनर लाइन परमिट लागू करने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव पर अभी विचार-विमर्श चल रहा है.
आंतरिक वीजा जैसा होता है इनर लाइन परमिट
देश में इस वक्त सिर्फ नागालैंड में ही इनर लाइन परमिट सिस्टम लागू है. बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन्स, 1873 के तहत यह व्यवस्था एक सीमित अवधि के लिए किसी संरक्षित, प्रतिबंधित क्षेत्र में दाखिल होने के लिए अनुमति देता है. नौकरी या फिर पर्यटन के लिए पहुंचने वालों को अनुमति लेनी जरूरी है. बताया जाता है कि गुलामी के दौर में ब्रिटिश सरकार ने इनर लाइन परमिट सिस्टम की शुरुआत की थी. तब नागालैंड क्षेत्र में जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक औषधियों का प्रचुर भंडार था. जिसे ब्रिटेन भेजा जाता था. औषधियों पर दूसरों की नजर न पड़े, इसके लिए ब्रिटिश शासन ने नागालैंड के हिस्से में इनर लाइन परमिट की शुरुआत की थी. ताकि इस इलाके का संपर्क बाहरी क्षेत्रों से न हो सके.
आजादी के बाद भी सरकार ने इनर लाइन परमिट को जारी रखा. इसके पीछे तर्क था कि नागा आदिवासियों का रहन-सहन, कला संस्कृति, बोलचाल औरों से अलग है. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है. ताकि बाहरी लोग यहां रहकर उनकी संस्कृति प्रभावित न कर सकें.
मूल अधिकार के खिलाफ है ILP
सुप्रीम कोर्ट में आईएलपी के खिलाफ याचिका दायर करने वाले अश्निनी उपाध्याय कहते हैं कि आईएलपी व्यवस्था अपने ही देश में वीजा लेने की तरह है. यह संविधान से भारतीय नागरिकों को मिले अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव की मनाही), 19 (स्वतंत्रता) और 21 (जीवन) के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. उपाध्याय ने कहा कि नागालैंड में 90 प्रतिशत आबादी ईसाई हो चुकी है. नागा आदिवासियों के संरक्षण के लिए इनर लाइन परमिट की व्यवस्था की गई थी. मगर अब जब 90 प्रतिशत आबादी वहां की ईसाई हो चुकी है, सरकार की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. हर गांव में चर्च है.
आदिवासी अपने पुराने रीति-रिवाजों की जगह चर्चों में ईसाई रीति-रिवाज से शादियां कर रहे हैं. ऐसे में अब नागाओं के संरक्षण के मकसद से लागू इनर लाइन परमिट का कोई औचित्य ही नहीं रहा. अश्निनी उपाध्याय का आरोप है कि नागालैंड के स्थानीय नेता अलगाववाद की दुकान चलाने के लिए चाहते हैं कि स्थानीय जनता का बाहर के लोगों से संपर्क न हो सके. इनर लाइन परमिट के जरिए देश-दुनिया से नागालैंड को काटने की कोशिश हो रही है. अब मैदानी क्षेत्र दीमापुर में भी राज्य सरकार परमिट सिस्टम लागू करना चाहती है. 2 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट उपाध्याय की याचिका यह कह कर खारिज कर चुका है कि अभी वह इस मसले को सुनना नहीं चाहता.
नागालैंड के बारे में खास बातें
-नागालैंड का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी है. सिर्फ दीमापुर ही मैदानी क्षेत्र हैं, जहां रेलवे और विमान सेवाएं उपलब्ध हैं. पहले दीमापुर असम के हिस्से में आता था. मगर नागालैंड को देश के परिवहन से जोड़ने के लिए उसे मैदानी क्षेत्र दीमापुर दे दिया गया. कोलकाता से दीमापुर को जोड़ने के लिए सप्ताह में तीन दिन इंडियन एयरलाइंस की उड़ान है. सरकारी वेबसाइट know india.gov पर नागालैंड के बारे में कई अहम जानकारियां हैं. मसलन,
यूं तो इनर लाइन परमिट रूल पहले जम्मू-कश्मीर में भी लागू था, मगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आंदोलन के बाद वहां परमिट सिस्टम खत्म हो गया. लेकिन, नागालैंड में यह नियम आज भी जारी है. अब यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनने लगा है.
हाल ही में बीजेपी नेता अश्निनी उपाध्याय इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर पहुंचे तो वहीं बीते 23 जुलाई को दो सांसदों ने भी लोकसभा में इनर लाइन परमिट सिस्टम के मुद्दे को उठाया. जिस पर सरकार ने कहा है कि भारतीय नागरिकों को अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और दीमापुर को छोड़कर नगालैंड में यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है. दीमापुर के लिए इनर लाइन परमिट लागू करने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव पर अभी विचार-विमर्श चल रहा है.
आंतरिक वीजा जैसा होता है इनर लाइन परमिट
देश में इस वक्त सिर्फ नागालैंड में ही इनर लाइन परमिट सिस्टम लागू है. बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन्स, 1873 के तहत यह व्यवस्था एक सीमित अवधि के लिए किसी संरक्षित, प्रतिबंधित क्षेत्र में दाखिल होने के लिए अनुमति देता है. नौकरी या फिर पर्यटन के लिए पहुंचने वालों को अनुमति लेनी जरूरी है. बताया जाता है कि गुलामी के दौर में ब्रिटिश सरकार ने इनर लाइन परमिट सिस्टम की शुरुआत की थी. तब नागालैंड क्षेत्र में जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक औषधियों का प्रचुर भंडार था. जिसे ब्रिटेन भेजा जाता था. औषधियों पर दूसरों की नजर न पड़े, इसके लिए ब्रिटिश शासन ने नागालैंड के हिस्से में इनर लाइन परमिट की शुरुआत की थी. ताकि इस इलाके का संपर्क बाहरी क्षेत्रों से न हो सके.
आजादी के बाद भी सरकार ने इनर लाइन परमिट को जारी रखा. इसके पीछे तर्क था कि नागा आदिवासियों का रहन-सहन, कला संस्कृति, बोलचाल औरों से अलग है. ऐसे में इनके संरक्षण के लिए इनर लाइन परमिट जरूरी है. ताकि बाहरी लोग यहां रहकर उनकी संस्कृति प्रभावित न कर सकें.
मूल अधिकार के खिलाफ है ILP
सुप्रीम कोर्ट में आईएलपी के खिलाफ याचिका दायर करने वाले अश्निनी उपाध्याय कहते हैं कि आईएलपी व्यवस्था अपने ही देश में वीजा लेने की तरह है. यह संविधान से भारतीय नागरिकों को मिले अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव की मनाही), 19 (स्वतंत्रता) और 21 (जीवन) के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. उपाध्याय ने कहा कि नागालैंड में 90 प्रतिशत आबादी ईसाई हो चुकी है. नागा आदिवासियों के संरक्षण के लिए इनर लाइन परमिट की व्यवस्था की गई थी. मगर अब जब 90 प्रतिशत आबादी वहां की ईसाई हो चुकी है, सरकार की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी हो चुकी है. हर गांव में चर्च है.
आदिवासी अपने पुराने रीति-रिवाजों की जगह चर्चों में ईसाई रीति-रिवाज से शादियां कर रहे हैं. ऐसे में अब नागाओं के संरक्षण के मकसद से लागू इनर लाइन परमिट का कोई औचित्य ही नहीं रहा. अश्निनी उपाध्याय का आरोप है कि नागालैंड के स्थानीय नेता अलगाववाद की दुकान चलाने के लिए चाहते हैं कि स्थानीय जनता का बाहर के लोगों से संपर्क न हो सके. इनर लाइन परमिट के जरिए देश-दुनिया से नागालैंड को काटने की कोशिश हो रही है. अब मैदानी क्षेत्र दीमापुर में भी राज्य सरकार परमिट सिस्टम लागू करना चाहती है. 2 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट उपाध्याय की याचिका यह कह कर खारिज कर चुका है कि अभी वह इस मसले को सुनना नहीं चाहता.
नागालैंड के बारे में खास बातें
-नागालैंड का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी है. सिर्फ दीमापुर ही मैदानी क्षेत्र हैं, जहां रेलवे और विमान सेवाएं उपलब्ध हैं. पहले दीमापुर असम के हिस्से में आता था. मगर नागालैंड को देश के परिवहन से जोड़ने के लिए उसे मैदानी क्षेत्र दीमापुर दे दिया गया. कोलकाता से दीमापुर को जोड़ने के लिए सप्ताह में तीन दिन इंडियन एयरलाइंस की उड़ान है. सरकारी वेबसाइट know india.gov पर नागालैंड के बारे में कई अहम जानकारियां हैं. मसलन,
Thursday, July 4, 2019
Самая секретная подлодка. Что загорелось под водой на Северном флоте?
В результате пожара на глубоководном аппарате погибли 14 моряков-подводников. Пожар возник во время батиметрических измерений, его потушили силами экипажа. Это вся информация, которую сообщило минобороны России и по которой можно судить о том, что произошло в море 1 июля.
Данных об аппарате, на котором возник пожар, министерство обороны не раскрыло. Тем не менее, исходя из этих сведений, можно сделать некоторые предположения.
Гибель 14 человек означает, что это был сравнительно крупный глубоководный аппарат. В различных изданиях и на профильных форумах в настоящее время сообщается о пяти-десяти пострадавших, доставленных в военный госпиталь. Если это окажется правдой, на борту могло находиться около 20 человек.
Поскольку аппарат, как сообщают военные, доставили в Североморск, который находится в Кольском заливе, значит авария могла произойти в Баренцевом море.
Исходя из того, что этот аппарат был глубоководным, он мог принадлежать 29-й отдельной бригаде подводных лодок, которая базируется на военной базе ВМФ Гаджиево в бухте Оленья губа. Это бригада, в составе которой - глубоководные аппараты.
Гаджиево - одна из самых секретных военных баз в России. 29-я бригада подчиняется главному управлению глубоководных исследований министерства обороны России, войсковой части 45707, которая расположена в Ленинградской области.
В состав 29-й отдельной бригады подводных лодок входят несколько глубоководных атомных субмарин специального назначения.
Среди них - аппарат проекта 10831, три аппарата проекта 1851, три - проекта 1910, а также носитель этих аппаратов - атомная подлодка БС-136 "Оренбург".
Численность экипажей глубоководных атомных подлодок проектов 1851 и 1910 составляет менее 14 человек.
Информация обо всех глубоководных аппаратах этой бригады строго засекречена, и все сведения, которые можно получить из открытых источников, могут быть неточными.
Возможно, именно эти рассуждения позволили журналистам и экспертам сделать вывод, что аварию потерпела атомная глубоководная подводная лодка АС-12 (атомная глубоководная станция) проекта 10831, получившая неофициальное название "Лошарик".
Об этой подлодке не известно почти ничего, а любая информация в открытых источниках содержит оговорки о том, что это только предположительные сведения.
Предположительно, глубина погружения АС-12 составляет до 1000 метров (но, возможно и гораздо больше), ее водоизмещение составляет около 2000 тонн, автономность - несколько месяцев, она способна выполнять различные работы на глубине при помощи манипуляторов и беспилотных дронов, у нее могут быть опоры для установки на грунт.
Экипаж может составлять 25 подводников.
Прочный корпус подлодки, предназначенный выдерживать давление воды, состоит из нескольких отсеков шарообразной формы. Поэтому АПЛ и получила название "Лошарик" - так звали героя советского мультфильма, лошадь, состоящую из шариков. Снаружи прочный корпус на подводных лодках не виден - его закрывает легкий корпус, который видно стороннему наблюдателю.
Российские специалисты заявляли, что этот аппарат, хотя и принадлежит министерству обороны, предназначен для научных исследований. В американских СМИ звучала версия о возможном применении этого аппарата для подводных диверсий.
В 2015 году автомобильное издание Top Gear, проводя фотосессию на берегу Баренцева моря, случайно сфотографировало подлодку, которую стало принято считать изображением "Лошарика".
Версия с "Оренбургом"
Другая версия - аварию якобы потерпела АПЛ "Оренбург", которая считается носителем таких глубоководных аппаратов.
Русская служба Би-би-си связалась с жителем Североморска, который утверждает, что видел подлодку после аварии.
"В 20:30 объявили тревогу силам флота. В 01:00 подлодка сама подошла к причалу в Североморске", - рассказал он.
"Три отсека [было] затоплено, в первом 13 человек на перестукивания не отвечали. Когда смогли добраться до отсека, установили, что все погибли", - утверждает собеседник Би-би-си. Подтвердить его рассказ не представляется возможным.
С версией о том, что пожар был на борту АПЛ "Оренбург", а не "Лошарика", также выступило издание "Открытые медиа".
В то же время сразу несколько военных экспертов рассказали Би-би-си, что лодка БС-136 "Оренбург" не могла использоваться, так как, по их сведениям, была списана еще несколько лет назад. По их словам, носителем "Лошарика" была атомная подлодка БС-64 "Подмосковье". Подтверждения этой информации в открытых российских источниках нет.
Как заявил агентству Рейтер директор Центра радиационной и ядерной безопасности Норвегии Пер Странд, российские власти сообщили, что на борту подлодки взорвался газ.
БС-136 "Оренбург", построенная еще в начале 1980-х и принятая на вооружение как К-129, за свою жизнь сменила не только индекс, но и проект.
Изначально созданная по проекту 667БДР "Кальмар" как носитель межконтинентальных ракет, она была перестроена по проекту 09786 в носителя малых подлодок.
Несколько лет назад сообщалось, что АПЛ "Оренбург" проходила ремонт, но информации о его результатах в открытых источниках нет. Информация об этой субмарине также глубоко засекречена.
В частности, достоверно не известна численность экипажа субмарины, но, исходя из того, что ее водоизмещение составляет примерно 15 тысяч тонн, на ее борту может быть больше 20 человек.
Данных об аппарате, на котором возник пожар, министерство обороны не раскрыло. Тем не менее, исходя из этих сведений, можно сделать некоторые предположения.
Гибель 14 человек означает, что это был сравнительно крупный глубоководный аппарат. В различных изданиях и на профильных форумах в настоящее время сообщается о пяти-десяти пострадавших, доставленных в военный госпиталь. Если это окажется правдой, на борту могло находиться около 20 человек.
Поскольку аппарат, как сообщают военные, доставили в Североморск, который находится в Кольском заливе, значит авария могла произойти в Баренцевом море.
Исходя из того, что этот аппарат был глубоководным, он мог принадлежать 29-й отдельной бригаде подводных лодок, которая базируется на военной базе ВМФ Гаджиево в бухте Оленья губа. Это бригада, в составе которой - глубоководные аппараты.
Гаджиево - одна из самых секретных военных баз в России. 29-я бригада подчиняется главному управлению глубоководных исследований министерства обороны России, войсковой части 45707, которая расположена в Ленинградской области.
В состав 29-й отдельной бригады подводных лодок входят несколько глубоководных атомных субмарин специального назначения.
Среди них - аппарат проекта 10831, три аппарата проекта 1851, три - проекта 1910, а также носитель этих аппаратов - атомная подлодка БС-136 "Оренбург".
Численность экипажей глубоководных атомных подлодок проектов 1851 и 1910 составляет менее 14 человек.
Информация обо всех глубоководных аппаратах этой бригады строго засекречена, и все сведения, которые можно получить из открытых источников, могут быть неточными.
Возможно, именно эти рассуждения позволили журналистам и экспертам сделать вывод, что аварию потерпела атомная глубоководная подводная лодка АС-12 (атомная глубоководная станция) проекта 10831, получившая неофициальное название "Лошарик".
Об этой подлодке не известно почти ничего, а любая информация в открытых источниках содержит оговорки о том, что это только предположительные сведения.
Предположительно, глубина погружения АС-12 составляет до 1000 метров (но, возможно и гораздо больше), ее водоизмещение составляет около 2000 тонн, автономность - несколько месяцев, она способна выполнять различные работы на глубине при помощи манипуляторов и беспилотных дронов, у нее могут быть опоры для установки на грунт.
Экипаж может составлять 25 подводников.
Прочный корпус подлодки, предназначенный выдерживать давление воды, состоит из нескольких отсеков шарообразной формы. Поэтому АПЛ и получила название "Лошарик" - так звали героя советского мультфильма, лошадь, состоящую из шариков. Снаружи прочный корпус на подводных лодках не виден - его закрывает легкий корпус, который видно стороннему наблюдателю.
Российские специалисты заявляли, что этот аппарат, хотя и принадлежит министерству обороны, предназначен для научных исследований. В американских СМИ звучала версия о возможном применении этого аппарата для подводных диверсий.
В 2015 году автомобильное издание Top Gear, проводя фотосессию на берегу Баренцева моря, случайно сфотографировало подлодку, которую стало принято считать изображением "Лошарика".
Версия с "Оренбургом"
Другая версия - аварию якобы потерпела АПЛ "Оренбург", которая считается носителем таких глубоководных аппаратов.
Русская служба Би-би-си связалась с жителем Североморска, который утверждает, что видел подлодку после аварии.
"В 20:30 объявили тревогу силам флота. В 01:00 подлодка сама подошла к причалу в Североморске", - рассказал он.
"Три отсека [было] затоплено, в первом 13 человек на перестукивания не отвечали. Когда смогли добраться до отсека, установили, что все погибли", - утверждает собеседник Би-би-си. Подтвердить его рассказ не представляется возможным.
С версией о том, что пожар был на борту АПЛ "Оренбург", а не "Лошарика", также выступило издание "Открытые медиа".
В то же время сразу несколько военных экспертов рассказали Би-би-си, что лодка БС-136 "Оренбург" не могла использоваться, так как, по их сведениям, была списана еще несколько лет назад. По их словам, носителем "Лошарика" была атомная подлодка БС-64 "Подмосковье". Подтверждения этой информации в открытых российских источниках нет.
Как заявил агентству Рейтер директор Центра радиационной и ядерной безопасности Норвегии Пер Странд, российские власти сообщили, что на борту подлодки взорвался газ.
БС-136 "Оренбург", построенная еще в начале 1980-х и принятая на вооружение как К-129, за свою жизнь сменила не только индекс, но и проект.
Изначально созданная по проекту 667БДР "Кальмар" как носитель межконтинентальных ракет, она была перестроена по проекту 09786 в носителя малых подлодок.
Несколько лет назад сообщалось, что АПЛ "Оренбург" проходила ремонт, но информации о его результатах в открытых источниках нет. Информация об этой субмарине также глубоко засекречена.
В частности, достоверно не известна численность экипажа субмарины, но, исходя из того, что ее водоизмещение составляет примерно 15 тысяч тонн, на ее борту может быть больше 20 человек.
Tuesday, June 25, 2019
美伊关系:美国实施新制裁 针对伊朗最高领袖哈梅内伊
美国总统特朗普签署行政令,对伊朗实施新一轮的严厉制裁,包括针对伊朗最高精神领袖阿亚图拉·阿里·哈梅内伊(Ayatollah Ali Khamenei)及其办公室的措施。
特朗普声称,施加额外制裁是对伊朗击落美国无人机以及“许多其他事情”的回应。
制裁特别针对伊朗最高权力机构阿亚图拉·阿里·哈梅内伊,因为他“对该政权的敌对行为负最终责任”。
伊朗外交部长贾瓦德·扎里夫(Javad Zarif)称美方“鄙视外交”。
美国宣布制裁后,扎里夫发表推文指责特朗普政府“渴望战争”。
然而,美国财政部长史蒂芬•姆钦(Steven Mnuchin)表示,特朗普的行政令将冻结伊朗数十亿美元的资产,该行政令是美国无人机上周于德黑兰海湾被击落之前制订的。
它补充说,特朗普的行政命令将"阻断伊朗领导层的金融渠道,阻止伊朗最高领导人及其办公室指派特定人员担任某些职位,以及针对帮助伊朗交易转账的外国金融机构。
据姆钦说法,本周晚些时候还将对扎里夫实施制裁。
制裁升级
BBC驻美国国务院特派员 芭芭拉·普莱特—厄舍尔(Barbara Plett-Usher)分析
对阿亚图拉·阿里·哈梅内伊实施制裁非常重要。他确实是伊朗的最高领袖,在伊朗政治和军事方面拥有最终发言权,而且他经济实力雄厚。
他监管着塞塔德组织,该组织征用了1979年革命之后被遗弃的财产,摇身一变,成为一家资产约950亿美元(750亿英镑)的商业巨头。
塞塔德已受到美国制裁,但特朗普更进一步,针对任何与哈梅内伊关联的人——可能还包括塞塔德公司董事会成员,或者他大规模“影子政府”的官员。
因此,美国政府正在加紧在石油和金融方面已有的严厉制裁,看看德黑兰最终是否会被迫投降和接受谈判。
美国要求伊朗结束其核计划,限制其弹道导弹生产,停止对阿拉伯武装分子的支持。
美国国务卿迈克•蓬佩奥(Mike Pomepo)表示,美国对伊朗施加“极大压力”,使伊朗无法获得充足资金支持其地区军事行动。
对于像蓬佩奥这样的鹰派而言,这或许是更重要的目标。他曾表示不相信伊朗政权会按照美国的要求改变。
早在2018年5月,美国白宫宣布退出奥巴马政府2015年与世界大国签订的暂停对伊朗制裁的伊核协议,逐步重启所有制裁。伊朗核协议原本旨在阻止伊朗制造自己的核武器。
两国关系持续恶化,到了今年5月,即特朗普退出伊核协议一年后,美国终止对购买伊朗石油的国家实行二级制裁的豁免,以此向伊朗施加更大压力。
随后海湾地区发生一系列针对油轮的袭击事件,白宫指责伊朗是幕后黑手。德黑兰方面否认了所有指控。
伊朗官员随后宣布将突破2015年6月27日达成的伊朗核协议规定的浓缩铀存量上限。
几天之后,美国无人机被击落,美国声称地点位于国际水域,但伊朗表示在其领土范围内。
美国先前如何制裁伊朗?
美国对伊朗的制裁——尤其是对能源、航运和金融部门的制裁——导致流向伊朗的外国投资枯竭,并打击石油出口。
美国禁止其公司与伊朗进行贸易,甚至禁止跟与伊朗打交道的外国公司或国家进行贸易。
这导致伊朗进口商品和利用国外原料制成的产品短缺,尤其是婴儿尿布。
伊朗货币里亚尔暴跌也影响当地农副产品,如肉蛋等价格飙升。
伊朗表示将违反部分核协议的承诺以应对经济压力。它还指责欧洲国家未能兑现其保护伊朗经济免受美国制裁的承诺。
美国无人机到底是什么事?
伊朗伊斯兰革命卫队表示,此次无人机的击落给美国一个明确信号:“伊朗的边界就是我们的红线”。
但美国军方官员声称,无人机当时正处于霍尔木兹海峡的国际空域。美国代理常驻联合国代表乔纳森·科恩(Jonathan Cohen)表示,“伊朗的论点是基于无人机处于该国飞航情报区,该区域与一个国家的领空不同。”
伊斯兰革命卫队一名高级官员阿米尔·阿里·哈吉扎德(Amir Ali Hajizadeh)说,另一架载有35名乘客的军用飞机无人机位置相近。 “我们本可以击落那一个,但我们没有。”
特朗普声称,施加额外制裁是对伊朗击落美国无人机以及“许多其他事情”的回应。
制裁特别针对伊朗最高权力机构阿亚图拉·阿里·哈梅内伊,因为他“对该政权的敌对行为负最终责任”。
伊朗外交部长贾瓦德·扎里夫(Javad Zarif)称美方“鄙视外交”。
美国宣布制裁后,扎里夫发表推文指责特朗普政府“渴望战争”。
然而,美国财政部长史蒂芬•姆钦(Steven Mnuchin)表示,特朗普的行政令将冻结伊朗数十亿美元的资产,该行政令是美国无人机上周于德黑兰海湾被击落之前制订的。
它补充说,特朗普的行政命令将"阻断伊朗领导层的金融渠道,阻止伊朗最高领导人及其办公室指派特定人员担任某些职位,以及针对帮助伊朗交易转账的外国金融机构。
据姆钦说法,本周晚些时候还将对扎里夫实施制裁。
制裁升级
BBC驻美国国务院特派员 芭芭拉·普莱特—厄舍尔(Barbara Plett-Usher)分析
对阿亚图拉·阿里·哈梅内伊实施制裁非常重要。他确实是伊朗的最高领袖,在伊朗政治和军事方面拥有最终发言权,而且他经济实力雄厚。
他监管着塞塔德组织,该组织征用了1979年革命之后被遗弃的财产,摇身一变,成为一家资产约950亿美元(750亿英镑)的商业巨头。
塞塔德已受到美国制裁,但特朗普更进一步,针对任何与哈梅内伊关联的人——可能还包括塞塔德公司董事会成员,或者他大规模“影子政府”的官员。
因此,美国政府正在加紧在石油和金融方面已有的严厉制裁,看看德黑兰最终是否会被迫投降和接受谈判。
美国要求伊朗结束其核计划,限制其弹道导弹生产,停止对阿拉伯武装分子的支持。
美国国务卿迈克•蓬佩奥(Mike Pomepo)表示,美国对伊朗施加“极大压力”,使伊朗无法获得充足资金支持其地区军事行动。
对于像蓬佩奥这样的鹰派而言,这或许是更重要的目标。他曾表示不相信伊朗政权会按照美国的要求改变。
早在2018年5月,美国白宫宣布退出奥巴马政府2015年与世界大国签订的暂停对伊朗制裁的伊核协议,逐步重启所有制裁。伊朗核协议原本旨在阻止伊朗制造自己的核武器。
两国关系持续恶化,到了今年5月,即特朗普退出伊核协议一年后,美国终止对购买伊朗石油的国家实行二级制裁的豁免,以此向伊朗施加更大压力。
随后海湾地区发生一系列针对油轮的袭击事件,白宫指责伊朗是幕后黑手。德黑兰方面否认了所有指控。
伊朗官员随后宣布将突破2015年6月27日达成的伊朗核协议规定的浓缩铀存量上限。
几天之后,美国无人机被击落,美国声称地点位于国际水域,但伊朗表示在其领土范围内。
美国先前如何制裁伊朗?
美国对伊朗的制裁——尤其是对能源、航运和金融部门的制裁——导致流向伊朗的外国投资枯竭,并打击石油出口。
美国禁止其公司与伊朗进行贸易,甚至禁止跟与伊朗打交道的外国公司或国家进行贸易。
这导致伊朗进口商品和利用国外原料制成的产品短缺,尤其是婴儿尿布。
伊朗货币里亚尔暴跌也影响当地农副产品,如肉蛋等价格飙升。
伊朗表示将违反部分核协议的承诺以应对经济压力。它还指责欧洲国家未能兑现其保护伊朗经济免受美国制裁的承诺。
美国无人机到底是什么事?
伊朗伊斯兰革命卫队表示,此次无人机的击落给美国一个明确信号:“伊朗的边界就是我们的红线”。
但美国军方官员声称,无人机当时正处于霍尔木兹海峡的国际空域。美国代理常驻联合国代表乔纳森·科恩(Jonathan Cohen)表示,“伊朗的论点是基于无人机处于该国飞航情报区,该区域与一个国家的领空不同。”
伊斯兰革命卫队一名高级官员阿米尔·阿里·哈吉扎德(Amir Ali Hajizadeh)说,另一架载有35名乘客的军用飞机无人机位置相近。 “我们本可以击落那一个,但我们没有。”
Monday, June 17, 2019
Майка спортсмена продана за $6 млн. Теперь она самая дорогая в истории
Спортивная майка-джерси легенды бейсбола 20-х годов Бейба Рута ушла с молотка в Нью-Йорке почти за 6 млн долларов, побив рекорд продаж спортивных реликвий на аукционах.
Рут превзошел собственное достижение: в 2012 году за 4,4 млн долларов была продана его джерси "Янкиз".
Легендарный бейсболист сделал 714 хоум-ранов за свою необычайно продолжительную 22-летнюю карьеру. Большую ее часть - 15 лет - он провел на знаменитом стадионе "Янки" в Бронксе, куда перебрался из соседнего Бостона.
В джерси, выставленной на аукцион в субботу, Рут играл в 1928-30-е годы. Покупатель, чье имя не называется, отдал за серую майку с вышитой эмблемой "Янкиз" 5,6 млн долларов. На аукцион семья бейсболиста и частные коллекционеры выставили более 400 вещей, имевших отношение к Руту.
Рут помог "Янкиз" выиграть семь чемпионских титулов Американской лиги и четыре Мировых серии и считается одним из величайших звезд бейсбола. "Ни одна личность в этой стране не внесла такого вклада в историю бейсбола и американского образа жизни, как Бейб Рут, - сказал президент аукционного дома Hunt Auctions Дэвид Хант. - Некоторым могут показаться цифры удивительны, но мне так не кажется, если учесть, что у Бейба в США статус главного национального героя".
Шум дошел до Москвы, и президент Владимир Путин предложил взять паузу, опросить жителей - и заставить меньшинство подчиниться большинству. Опрос ВЦИОМ выявил, что большинство (58%) против. Городские власти составили новый список из пяти площадок, и в него опять вошел сквер у театра - правда, при условии уменьшения размеров храма. Осенью они собирались опросить горожан и определить место, однако церковь не стала дожидаться результатов.
"В атмосфере тотальной лжи и обмана даже участок, выбранный открыто и честно большинством горожан, всё равно станет причиной раздора для людей, желающих разбудить древнего демона гражданской междоусобицы", - объяснил решение Екатеринбургской епархии местный митрополит Кирилл.
"Мы бы не хотели давать диаволу такую возможность, а потому с покорностью божественному промыслу, ведущему нас ему одному ведомыми путями, отказываемся от права строить собор святой Екатерины в сквере у драмтеатра", - говорится в послании митрополита.
"Мы услышали аргументы защитников сквера от застройки и согласились с тем, что площадка под строительство кафедрального собора не будет располагаться в каком-либо сквере или на территории зелёных насаждений, да и вообще на общественной территории, - цитирует епархия митрополита. - Мы слышали от сторонников сквера, что их протест связан с защитой общественных территорий от застройки и не возник бы, если бы строить начали на выкупленной земле. И хотя мы многократно убеждались, что не стоит верить ни единому их слову, сделаем так, как они хотят в очередной раз".
Рут превзошел собственное достижение: в 2012 году за 4,4 млн долларов была продана его джерси "Янкиз".
Легендарный бейсболист сделал 714 хоум-ранов за свою необычайно продолжительную 22-летнюю карьеру. Большую ее часть - 15 лет - он провел на знаменитом стадионе "Янки" в Бронксе, куда перебрался из соседнего Бостона.
В джерси, выставленной на аукцион в субботу, Рут играл в 1928-30-е годы. Покупатель, чье имя не называется, отдал за серую майку с вышитой эмблемой "Янкиз" 5,6 млн долларов. На аукцион семья бейсболиста и частные коллекционеры выставили более 400 вещей, имевших отношение к Руту.
Рут помог "Янкиз" выиграть семь чемпионских титулов Американской лиги и четыре Мировых серии и считается одним из величайших звезд бейсбола. "Ни одна личность в этой стране не внесла такого вклада в историю бейсбола и американского образа жизни, как Бейб Рут, - сказал президент аукционного дома Hunt Auctions Дэвид Хант. - Некоторым могут показаться цифры удивительны, но мне так не кажется, если учесть, что у Бейба в США статус главного национального героя".
Шум дошел до Москвы, и президент Владимир Путин предложил взять паузу, опросить жителей - и заставить меньшинство подчиниться большинству. Опрос ВЦИОМ выявил, что большинство (58%) против. Городские власти составили новый список из пяти площадок, и в него опять вошел сквер у театра - правда, при условии уменьшения размеров храма. Осенью они собирались опросить горожан и определить место, однако церковь не стала дожидаться результатов.
"В атмосфере тотальной лжи и обмана даже участок, выбранный открыто и честно большинством горожан, всё равно станет причиной раздора для людей, желающих разбудить древнего демона гражданской междоусобицы", - объяснил решение Екатеринбургской епархии местный митрополит Кирилл.
"Мы бы не хотели давать диаволу такую возможность, а потому с покорностью божественному промыслу, ведущему нас ему одному ведомыми путями, отказываемся от права строить собор святой Екатерины в сквере у драмтеатра", - говорится в послании митрополита.
"Мы услышали аргументы защитников сквера от застройки и согласились с тем, что площадка под строительство кафедрального собора не будет располагаться в каком-либо сквере или на территории зелёных насаждений, да и вообще на общественной территории, - цитирует епархия митрополита. - Мы слышали от сторонников сквера, что их протест связан с защитой общественных территорий от застройки и не возник бы, если бы строить начали на выкупленной земле. И хотя мы многократно убеждались, что не стоит верить ни единому их слову, сделаем так, как они хотят в очередной раз".
Thursday, May 30, 2019
Песков попросил экспертов объяснить, что происходит с рейтингами Путина. Они объяснили
Уже несколько дней российские социологи и политики обсуждают колебания рейтингов Владимира Путина. Дошло до того, что пресс-секретарь главы государства Дмитрий Песков попросил провести отдельный анализ ситуации и выяснить, падают ли все-таки рейтинги или растут.
Рейтинги президента России обрушились в 2018 году после объявления властей о планах повысить пенсионный возраст. С тех пор показатели уровня доверия президенту и готовности голосовать за него на выборах колебались в диапазоне нескольких процентных пунктов.
Очередной повод для разногласий возник в конце мая, когда ВЦИОМ выпустил результаты очередного исследования. Согласно ему, политику Путину доверяют 31,7% россиян - этот показатель достиг минимума с января 2006 года. Деятельность президента России как института государственной власти одобряют 65,8% опрошенных.
В четверг колебания рейтингов комментировал пресс-секретарь президента Дмитрий Песков. Он обратил внимание на то, что хотя рейтинг доверия президенту и падает, но другой рейтинг - электоральный - растет.
Рейтинг доверия - это результаты ответов респондентов на вопрос: "Доверяете ли вы политику?" (варианты ответов - "доверяю" или "не доверяю") или на вопрос: "Кому из политиков вы доверяете?" (можно назвать одного из политиков). То, что вызвало последние дискуссии - это как раз тот случай, когда респондентов просили выбрать из нескольких политиков (Владимир Путин, Сергей Шойгу, Сергей Лавров, Владимир Жириновский, Дмитрий Медведев, Геннадий Зюганов, Павел Грудинин и др.).
Электоральный рейтинг - это результаты ответов на вопрос: "Если бы выборы прошли в ближайшее воскресенье, за кого бы вы проголосовали?". Согласно последнему опросу фонда "Общественное мнение" (ФОМ), 50% россиян готовы голосовать за Путина (опрос от 19 мая 2019 года), этот показатель действительно вырос с начала года. Правда, следующие президентские выборы состоятся только в 2024 году, и по конституции Владимир Путин не вправе выдвигать свою кандидатуру.
"Мы ждем какого-то анализа наших уважаемых специалистов, как коррелируются эти данные: как может падать уровень доверия, но расти электоральный рейтинг. Это сложный анализ, мы надеемся, что со временем он появится", - подчеркнул пресс-секретарь, добавив, что в Кремле обращают внимание "на все работы наших экспертов в этой области".
Как же так выходит, что, если верить опросам, все меньше людей верят президенту, но все больше готовы голосовать за него?
Лев Гудков, директор "Левада-центра":
"Электоральный рейтинг - это примерно, если бы выборы состоялись в ближайшее воскресенье, за кого бы вы проголосовали. И там большинство действительно проголосовало бы за Путина, если считать от тех, кого мобилизовали и принудили прийти и проголосовать. Это безальтернативная ситуация на выборах. Политическое поле выжжено, оппозиционных кандидатов и критиков Путина к выборам не пускают. Поэтому нет реальной конкуренции, нет выбора. Напротив, работает машина принудительной аккламации - демонстративной поддержки того, у кого и так есть власть. Это не ситуация выбора.
А доверие характеризует ситуацию в стране - мобилизованности, конфронтации, снижения доходов, так как они снизились уже на 11-13% и имеют дальнейшую тенденцию к снижению. Это просто другой показатель. Он упал после того, как Путин подписал законопроект о повышении пенсионного возраста, и после некоторой стабилизации в ноябре он держится примерно на одном уровне. Но социальное недовольство растет и, не имея выхода, не имея возможность представить его публичной сфере, оно имеет выход такого разлитого недовольства".
"Если говорить о рейтингах ВЦИОМа, сейчас тренда на изменение показателей одобрения деятельности президента нет. По доверию Путину, может, и есть, но совсем небольшой. Если говорить о ФОМ, то после падения на фоне пенсионной реформы нет тренда по обоим вопросам.
В целом после падения лета прошлого года, связанного с нереализованными ожиданиями от нового срока [Путина], тренда нет ни по одному вопросу у обоих поллстеров. Так что вся последняя дискуссия высосана из пальца.
Чем объясняется большой разрыв между показателями доверия к президенту и одобрения его деятельности? Во-первых, опрос о доверии - открытый (людям предлагается самостоятельно вспомнить политиков, которым они доверяют - Би-би-си).
Кроме того, доверие - это личное отношение, а одобрение должностного лица - экспертное суждение. Экспертные суждения респонденты обычно боятся выносить, они не считают себя специалистами. В России считается, что политика - это дело для специалистов. Раз страна стоит - значит, наверное, нормально работает руководитель. А доверие - это личная эмоция, тут люди могут уже конкретнее за себя говорить".
Рейтинги президента России обрушились в 2018 году после объявления властей о планах повысить пенсионный возраст. С тех пор показатели уровня доверия президенту и готовности голосовать за него на выборах колебались в диапазоне нескольких процентных пунктов.
Очередной повод для разногласий возник в конце мая, когда ВЦИОМ выпустил результаты очередного исследования. Согласно ему, политику Путину доверяют 31,7% россиян - этот показатель достиг минимума с января 2006 года. Деятельность президента России как института государственной власти одобряют 65,8% опрошенных.
В четверг колебания рейтингов комментировал пресс-секретарь президента Дмитрий Песков. Он обратил внимание на то, что хотя рейтинг доверия президенту и падает, но другой рейтинг - электоральный - растет.
Рейтинг доверия - это результаты ответов респондентов на вопрос: "Доверяете ли вы политику?" (варианты ответов - "доверяю" или "не доверяю") или на вопрос: "Кому из политиков вы доверяете?" (можно назвать одного из политиков). То, что вызвало последние дискуссии - это как раз тот случай, когда респондентов просили выбрать из нескольких политиков (Владимир Путин, Сергей Шойгу, Сергей Лавров, Владимир Жириновский, Дмитрий Медведев, Геннадий Зюганов, Павел Грудинин и др.).
Электоральный рейтинг - это результаты ответов на вопрос: "Если бы выборы прошли в ближайшее воскресенье, за кого бы вы проголосовали?". Согласно последнему опросу фонда "Общественное мнение" (ФОМ), 50% россиян готовы голосовать за Путина (опрос от 19 мая 2019 года), этот показатель действительно вырос с начала года. Правда, следующие президентские выборы состоятся только в 2024 году, и по конституции Владимир Путин не вправе выдвигать свою кандидатуру.
"Мы ждем какого-то анализа наших уважаемых специалистов, как коррелируются эти данные: как может падать уровень доверия, но расти электоральный рейтинг. Это сложный анализ, мы надеемся, что со временем он появится", - подчеркнул пресс-секретарь, добавив, что в Кремле обращают внимание "на все работы наших экспертов в этой области".
Как же так выходит, что, если верить опросам, все меньше людей верят президенту, но все больше готовы голосовать за него?
Лев Гудков, директор "Левада-центра":
"Электоральный рейтинг - это примерно, если бы выборы состоялись в ближайшее воскресенье, за кого бы вы проголосовали. И там большинство действительно проголосовало бы за Путина, если считать от тех, кого мобилизовали и принудили прийти и проголосовать. Это безальтернативная ситуация на выборах. Политическое поле выжжено, оппозиционных кандидатов и критиков Путина к выборам не пускают. Поэтому нет реальной конкуренции, нет выбора. Напротив, работает машина принудительной аккламации - демонстративной поддержки того, у кого и так есть власть. Это не ситуация выбора.
А доверие характеризует ситуацию в стране - мобилизованности, конфронтации, снижения доходов, так как они снизились уже на 11-13% и имеют дальнейшую тенденцию к снижению. Это просто другой показатель. Он упал после того, как Путин подписал законопроект о повышении пенсионного возраста, и после некоторой стабилизации в ноябре он держится примерно на одном уровне. Но социальное недовольство растет и, не имея выхода, не имея возможность представить его публичной сфере, оно имеет выход такого разлитого недовольства".
"Если говорить о рейтингах ВЦИОМа, сейчас тренда на изменение показателей одобрения деятельности президента нет. По доверию Путину, может, и есть, но совсем небольшой. Если говорить о ФОМ, то после падения на фоне пенсионной реформы нет тренда по обоим вопросам.
В целом после падения лета прошлого года, связанного с нереализованными ожиданиями от нового срока [Путина], тренда нет ни по одному вопросу у обоих поллстеров. Так что вся последняя дискуссия высосана из пальца.
Чем объясняется большой разрыв между показателями доверия к президенту и одобрения его деятельности? Во-первых, опрос о доверии - открытый (людям предлагается самостоятельно вспомнить политиков, которым они доверяют - Би-би-си).
Кроме того, доверие - это личное отношение, а одобрение должностного лица - экспертное суждение. Экспертные суждения респонденты обычно боятся выносить, они не считают себя специалистами. В России считается, что политика - это дело для специалистов. Раз страна стоит - значит, наверное, нормально работает руководитель. А доверие - это личная эмоция, тут люди могут уже конкретнее за себя говорить".
Wednesday, May 22, 2019
"Иностранные агенты" в России получили больше денег из-за границы
Финансирование российских некоммерческих организаций из-за рубежа в 2018 году выросло почти на четверть. Об этом говорится в ежегодном докладе минюста России о деятельности НКО, включенных в реестр иностранных агентов. Он подготовлен для Госдумы, Би-би-си ознакомилась с ним.
Если в 2017 году "агенты" получили из-за рубежа 603,5 млн рублей, то в прошлом году - 759,2 млн рублей, следует из документа. Таким образом, они получили на 26% больше.
В основном деньги для "агентов" направлялись из Германии, Великобритании, США, Бельгии и Норвегии. Среди организаций, перечисливших больше всего средств, минюст называет несколько организаций.
Управление верховного комиссара ООН по делам беженцев, по данным реестра, выделяло деньги организации помощи беженцам и мигрантам "Гражданское содействие" и правозащитному центру "Мемориал". Еврокомиссия также финансировала "Мемориал", а еще саратовский еврейский благотворительный центр "Хасдей Ерушалаим", московский благотворительный фонд помощи осужденным и их семьям и другие организации.
OAK Foundation Ltd и Sigrid Rausing Trust (Великобритания) выделяли деньги фонду "Сфера" (Петербург), который поддерживает представителей ЛГБТ-сообщества, и информационно-методическому центру "Анна" (Москва), который помогает женщинам и детям, находящимся в кризисной ситуации и другим организациям.
Den Norske Helsingforskomite (Норвегия) финансировал "Гражданское содействие" и правозащитный центр "Мемориал", а также правозащитную организацию "Гражданский контроль" (Петербург) и "Голос" (Москва), организацию, занимающуюся наблюдением за выборами.
Как следует из доклада минюста России, НКО-"агенты" в прошлом году в основном занимались финансовой поддержкой СМИ, просветительской деятельностью по здоровому образу жизни и профилактике ВИЧ, защитой прав страдающих ВИЧ и наркозависимостью, проектами сотрудничества и установления связей между Россией и скандинавскими странами, Исландией и Финляндией и другой деятельностью.
Всего в реестре минюста России числится 75 "агентов". Из них финансирование из-за рубежа в 2018 году получили 46. В 2017 году таких НКО было 38.
Минюст готовит доклады по деятельности НКО совместно с российской финансовой разведкой - Росфинмониторингом. Именно эта служба предоставляет минюсту данные о движениях средств для НКО.
В отчете минюста речь идет не только об НКО, включенных в реестр иностранных агентов. Деньги из-за рубежа получают не только они.
В 2017 году российские НКО - их гораздо больше, чем "агентов" - получили из-за границы 69,4 млрд рублей, в 2018 году - 85,9 млрд рублей ("агенты" 603,5 млн рублей в 2017 году и 759,2 млн рублей в 2018-м).
Таким образом, иностранное финансирование российских НКО в прошлом году выросло на 23,7% ("агентов" - на 26% больше).
Зарубежное финансирование, согласно докладу, в прошлом году было у 3,9 тыс. российских НКО. Получается, в среднем по 22 млн рублей на одну организацию.
Основными странами, откуда НКО получали средства, в прошлом году стали США, Швейцария, Германия, Великобритания и Кипр.
В марте этого года руководитель Росфинмониторинга Юрий Чиханчин на встрече с президентом Владимиром Путиным сообщил, что российским НКО продолжает поступать иностранное финансирование - "и не все для благих целей".
"Где-то порядка 80 млрд [рублей] мы отслеживаем, мы пытаемся понять", - сказал тогда Чиханчин. Он не уточнил, о каких именно НКО идет речь.
Глава Росфинмониторинга говорил также, что часть денег из иностранных источников "идут на определенные степени деструктивности", при этом наибольшее количество средств направляются в систему образования.
Закон об "иностранных агентах", накладывающий ограничения на деятельность некоммерческих организаций, вступил в силу в ноябре 2012 года. "Агентами" признаются организации, имеющие иностранное финансирование и участвующие в политической деятельности.
Такие организации минюст России включает в реестр иностранных агентов. Годовая финансовая отчетность организаций подлежит обязательному аудиту. Признанные агентами НКО обязаны раз в полгода отчитываться перед минюстом о своей деятельности и о персональном составе руководящих органов. Подавать документы о расходовании денежных средств они должны ежеквартально.
Кроме того, у таких НКО появилась обязанность указывать на своих материалах, что они "распространены организацией, выполняющей функции иностранного агента".
С 2018 года иностранными агентами признаются некоммерческие организации, получающие деньги не только напрямую от иностранных структур, но и от российских юрлиц с иностранными источниками финансирования.
Президент Владимир Путин в 2012 году объяснял необходимость закона следующим образом: "Недопустимо зарубежное влияние на нашу внутреннюю политику. Мы не должны допускать, чтобы кто-то из-за границы исподтишка с помощью финансирования влиял на нее. Мы должны знать, кто эти люди".
Если в 2017 году "агенты" получили из-за рубежа 603,5 млн рублей, то в прошлом году - 759,2 млн рублей, следует из документа. Таким образом, они получили на 26% больше.
В основном деньги для "агентов" направлялись из Германии, Великобритании, США, Бельгии и Норвегии. Среди организаций, перечисливших больше всего средств, минюст называет несколько организаций.
Управление верховного комиссара ООН по делам беженцев, по данным реестра, выделяло деньги организации помощи беженцам и мигрантам "Гражданское содействие" и правозащитному центру "Мемориал". Еврокомиссия также финансировала "Мемориал", а еще саратовский еврейский благотворительный центр "Хасдей Ерушалаим", московский благотворительный фонд помощи осужденным и их семьям и другие организации.
OAK Foundation Ltd и Sigrid Rausing Trust (Великобритания) выделяли деньги фонду "Сфера" (Петербург), который поддерживает представителей ЛГБТ-сообщества, и информационно-методическому центру "Анна" (Москва), который помогает женщинам и детям, находящимся в кризисной ситуации и другим организациям.
Den Norske Helsingforskomite (Норвегия) финансировал "Гражданское содействие" и правозащитный центр "Мемориал", а также правозащитную организацию "Гражданский контроль" (Петербург) и "Голос" (Москва), организацию, занимающуюся наблюдением за выборами.
Как следует из доклада минюста России, НКО-"агенты" в прошлом году в основном занимались финансовой поддержкой СМИ, просветительской деятельностью по здоровому образу жизни и профилактике ВИЧ, защитой прав страдающих ВИЧ и наркозависимостью, проектами сотрудничества и установления связей между Россией и скандинавскими странами, Исландией и Финляндией и другой деятельностью.
Всего в реестре минюста России числится 75 "агентов". Из них финансирование из-за рубежа в 2018 году получили 46. В 2017 году таких НКО было 38.
Минюст готовит доклады по деятельности НКО совместно с российской финансовой разведкой - Росфинмониторингом. Именно эта служба предоставляет минюсту данные о движениях средств для НКО.
В отчете минюста речь идет не только об НКО, включенных в реестр иностранных агентов. Деньги из-за рубежа получают не только они.
В 2017 году российские НКО - их гораздо больше, чем "агентов" - получили из-за границы 69,4 млрд рублей, в 2018 году - 85,9 млрд рублей ("агенты" 603,5 млн рублей в 2017 году и 759,2 млн рублей в 2018-м).
Таким образом, иностранное финансирование российских НКО в прошлом году выросло на 23,7% ("агентов" - на 26% больше).
Зарубежное финансирование, согласно докладу, в прошлом году было у 3,9 тыс. российских НКО. Получается, в среднем по 22 млн рублей на одну организацию.
Основными странами, откуда НКО получали средства, в прошлом году стали США, Швейцария, Германия, Великобритания и Кипр.
В марте этого года руководитель Росфинмониторинга Юрий Чиханчин на встрече с президентом Владимиром Путиным сообщил, что российским НКО продолжает поступать иностранное финансирование - "и не все для благих целей".
"Где-то порядка 80 млрд [рублей] мы отслеживаем, мы пытаемся понять", - сказал тогда Чиханчин. Он не уточнил, о каких именно НКО идет речь.
Глава Росфинмониторинга говорил также, что часть денег из иностранных источников "идут на определенные степени деструктивности", при этом наибольшее количество средств направляются в систему образования.
Закон об "иностранных агентах", накладывающий ограничения на деятельность некоммерческих организаций, вступил в силу в ноябре 2012 года. "Агентами" признаются организации, имеющие иностранное финансирование и участвующие в политической деятельности.
Такие организации минюст России включает в реестр иностранных агентов. Годовая финансовая отчетность организаций подлежит обязательному аудиту. Признанные агентами НКО обязаны раз в полгода отчитываться перед минюстом о своей деятельности и о персональном составе руководящих органов. Подавать документы о расходовании денежных средств они должны ежеквартально.
Кроме того, у таких НКО появилась обязанность указывать на своих материалах, что они "распространены организацией, выполняющей функции иностранного агента".
С 2018 года иностранными агентами признаются некоммерческие организации, получающие деньги не только напрямую от иностранных структур, но и от российских юрлиц с иностранными источниками финансирования.
Президент Владимир Путин в 2012 году объяснял необходимость закона следующим образом: "Недопустимо зарубежное влияние на нашу внутреннюю политику. Мы не должны допускать, чтобы кто-то из-за границы исподтишка с помощью финансирования влиял на нее. Мы должны знать, кто эти люди".
Thursday, April 25, 2019
श्रीलंका में चरमपंथी हमलों की ख़ुफ़िया जानकारी भारत को कैसे मिली?
श्रीलंका में 21 अप्रैल को हुए चरमपंथी हमलों की चल रही जांच के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन हमलों को रोका जा सकता था. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि हमले से दो हफ़्ते पहले भारत ने इसे लेकर आगाह किया था.
भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यदि श्रीलंकाई अधिकारियों ने समय रहते भारत से मिली सूचना पर कार्रवाई की होती तो सीरियल धमाकों को रोका जा सकता था.
आतंकवाद विरोधी मामलों पर अमरीका और अन्य देशों को अक्सर सलाह देने वाली ऑस्ट्रेलिया स्थित लीडिया खलील का मानना है कि ये हमले निश्चित रूप से रोके जा सकते थे. उन्होंने कहा, "यह कई स्तरों पर हुई चूक की वजह से हुआ."
आतंकवाद विरोधी मामलों के जानकार भारतीय पत्रकार प्रवीण स्वामी ने कहा कि उनके पास वो दस्तावेज़ हैं जिनसे यह साबित होता है कि भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारियों ने अपने श्रीलंकाई समकक्षों को चर्चों और पर्यटन स्थलों में संभावित साज़िश को लेकर आगाह किया था.
सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात से आश्चर्य हो रहा है कि भारत से दो हफ़्ते पहले इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिलने के बावजूद ईस्टर संडे के दिन हमले होते हैं जो यह साफ़ बताता है कि श्रीलंकाई अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.
श्रीलंका की सरकार ने भारत का नाम लिए बगैर यह स्वीकार किया था कि चरमपंथी हमले को लेकर एक देश ने सूचनाएं दी थीं.
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने कहा, "जिन सुरक्षा अधिकारियों को विदेशी राष्ट्र से ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी, उन्होंने उसे मेरे साथ साझा नहीं किया."
प्रवीण स्वामी कहते हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच राजनीतिक रिश्तों में हमेशा गर्मजोशी नहीं रहने के बावजूद दोनों देशों के ख़ुफ़िया विभाग सुरक्षा से जुड़ी सूचनाएं एक दूसरे के साथ हमेशा साझा करते रहे हैं.
वो कहते हैं, "मेरे विचार में, राजनीति में तनाव के बावजूद दोनों देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच मज़बूत रिश्ते हैं. कुछ श्रीलंकाई राजनेताओं पर रॉ के गंभीर आरोपों के बावजूद दोनों के बीच संपर्क बने हुए हैं और इन्होंने साथ काम करना जारी रखा."
दिल्ली स्थित सुरक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन कहते हैं कि 1991 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दोनों देशों के बीच ख़ुफ़िया जानकारियों को साझा करना और भी नियमित हो गया. एलटीटीई, जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, को राजीव गांधी की हत्या का ज़िम्मेदार ठहराया गया था.
सरीन का मानना है कि भारत की रॉ जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियां सुरक्षा कारणों से दूसरे देशों के साथ पूरी जानकारी कभी साझा नहीं करेगी लेकिन कार्रवाई योग्य जानकारी ज़रूर उपलब्ध कराई जाती है. लेकिन ईस्टर संडे के दिन श्रीलंका में हुए हमले के मामले में, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बहुत सटीक जानकारी साझा की थी.
स्वामी के मुताबिक, संभावित प्लॉट की जानकारी में कुछ संभावित संदिग्धों के नाम और पते तक का विवरण था, जिसमें से कई वास्तव में हमलावर निकले.
लिहाज़ा इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने सुरक्षा एजेंसी के स्तर पर बड़े बदलाव का वादा किया है.
उन्होंने कहा, "विदेशी राष्ट्र से मिली सूचना को खुद तक रखने की बड़ी चूक करने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ मैंने कड़ी कार्रवाई करने का फ़ैसला किया है."
इसके बीच श्रीलंका में मीडिया यह पूछ रहा है कि भारत को स्थानीय इस्लामिक संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) के सदस्यों की इस हमले में शामिल होने का पता कैसे चला, श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास इन हमलों का कोई सुराग़ क्यों नहीं था? वे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों से मिली हमलों की जानकारी पर अधिकारियों की उदासीनता पर भी सवाल उठा रहे हैं.
लेकिन भारतीय एजेंसियों को श्रीलंका में संभावित हमलों और संदिग्धों के बारे में इतनी सटीक जानकारियां कैसे थी?
इसी साल श्रीलंका के एक दूर दराज के खेत में 100 किलो विस्फ़ोटक और गोला-बारूद की बरामदगी के बाद से नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) भारतीय और श्रीलंकाई एजेंसियों के रडार पर था.
स्वामी कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि यह इलाका कथित जेहादियों की ट्रेनिंग का मैदान था और यह एनटीजे देश के कुछ बौद्ध स्मारकों को उड़ाने की योजना बना रहा था.
सरीन कहते हैं कि किसी दूसरे देश के बारे में इतनी जानकारी हासिल करना ख़ुफ़िया विभाग के लिए कोई असमान्य बात नहीं है.
वो कहते हैं, "मैंने सुना है कि हाल ही में रॉ एक संदिग्ध से पूछताछ कर रहा था और उसी दौरान श्रीलंका में सीरियल धमाकों की जानकारी उसे मिली."
रॉ या कोई अन्य ख़ुफ़िया एजेंसियां अक्सर ऐसी सूचनाओं पर टिप्पणी नहीं करतीं. लेकिन यहां यह बात उल्लेखनीय है कि भारतीय और श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच संबंध विश्वास पर आधारित है.
तो क्या श्रीलंका चरमपंथी हमले की जांच में भारत को शामिल करेगा?
सरीन का मानना है कि सहयोग तो पहले से ही हो रहा है. हालांकि वो कहते हैं कि इसके बारे में मीडिया को कभी पता नहीं चल सकेगा.
बेशक श्रीलंकाई सरकार ने विदेशी शक्तियों से मदद मांगी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि रविवार को जो हमले हुए उसमें उसकी योजना बनाने और अंजाम देने में किसी विदेशी चरमपंथी संगठन का हाथ था या नहीं.
अमरीकी एफ़बीआई इसमें सहयोग कर रही है लेकिन भारत का नाम अभी तक सामने नहीं आया है.
सरीन के मुताबिक, "भारत के पास सटीक जानकारी है और जांच में उसकी भागीदारी अपेक्षित है. यह भारत के राष्ट्रीय हित में भी है."
हाल के दिनों में कई पड़ोसी देशों के साथ भारत का ख़ुफ़िया और सुरक्षा सहयोग पहले से अधिक मज़बूत हुआ है.
नरेंद्र मोदी सरकार ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के साथ सुरक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं.
सरीन कहते हैं, "70-80 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में रहते हैं उनमें से कुछ चरमपंथ विचारधारा के साथ सलफ़ी या कट्टर मुसलमान बन जाते हैं.
भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यदि श्रीलंकाई अधिकारियों ने समय रहते भारत से मिली सूचना पर कार्रवाई की होती तो सीरियल धमाकों को रोका जा सकता था.
आतंकवाद विरोधी मामलों पर अमरीका और अन्य देशों को अक्सर सलाह देने वाली ऑस्ट्रेलिया स्थित लीडिया खलील का मानना है कि ये हमले निश्चित रूप से रोके जा सकते थे. उन्होंने कहा, "यह कई स्तरों पर हुई चूक की वजह से हुआ."
आतंकवाद विरोधी मामलों के जानकार भारतीय पत्रकार प्रवीण स्वामी ने कहा कि उनके पास वो दस्तावेज़ हैं जिनसे यह साबित होता है कि भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारियों ने अपने श्रीलंकाई समकक्षों को चर्चों और पर्यटन स्थलों में संभावित साज़िश को लेकर आगाह किया था.
सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात से आश्चर्य हो रहा है कि भारत से दो हफ़्ते पहले इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिलने के बावजूद ईस्टर संडे के दिन हमले होते हैं जो यह साफ़ बताता है कि श्रीलंकाई अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.
श्रीलंका की सरकार ने भारत का नाम लिए बगैर यह स्वीकार किया था कि चरमपंथी हमले को लेकर एक देश ने सूचनाएं दी थीं.
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने कहा, "जिन सुरक्षा अधिकारियों को विदेशी राष्ट्र से ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी, उन्होंने उसे मेरे साथ साझा नहीं किया."
प्रवीण स्वामी कहते हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच राजनीतिक रिश्तों में हमेशा गर्मजोशी नहीं रहने के बावजूद दोनों देशों के ख़ुफ़िया विभाग सुरक्षा से जुड़ी सूचनाएं एक दूसरे के साथ हमेशा साझा करते रहे हैं.
वो कहते हैं, "मेरे विचार में, राजनीति में तनाव के बावजूद दोनों देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच मज़बूत रिश्ते हैं. कुछ श्रीलंकाई राजनेताओं पर रॉ के गंभीर आरोपों के बावजूद दोनों के बीच संपर्क बने हुए हैं और इन्होंने साथ काम करना जारी रखा."
दिल्ली स्थित सुरक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन कहते हैं कि 1991 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दोनों देशों के बीच ख़ुफ़िया जानकारियों को साझा करना और भी नियमित हो गया. एलटीटीई, जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, को राजीव गांधी की हत्या का ज़िम्मेदार ठहराया गया था.
सरीन का मानना है कि भारत की रॉ जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियां सुरक्षा कारणों से दूसरे देशों के साथ पूरी जानकारी कभी साझा नहीं करेगी लेकिन कार्रवाई योग्य जानकारी ज़रूर उपलब्ध कराई जाती है. लेकिन ईस्टर संडे के दिन श्रीलंका में हुए हमले के मामले में, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बहुत सटीक जानकारी साझा की थी.
स्वामी के मुताबिक, संभावित प्लॉट की जानकारी में कुछ संभावित संदिग्धों के नाम और पते तक का विवरण था, जिसमें से कई वास्तव में हमलावर निकले.
लिहाज़ा इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने सुरक्षा एजेंसी के स्तर पर बड़े बदलाव का वादा किया है.
उन्होंने कहा, "विदेशी राष्ट्र से मिली सूचना को खुद तक रखने की बड़ी चूक करने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ मैंने कड़ी कार्रवाई करने का फ़ैसला किया है."
इसके बीच श्रीलंका में मीडिया यह पूछ रहा है कि भारत को स्थानीय इस्लामिक संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) के सदस्यों की इस हमले में शामिल होने का पता कैसे चला, श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास इन हमलों का कोई सुराग़ क्यों नहीं था? वे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों से मिली हमलों की जानकारी पर अधिकारियों की उदासीनता पर भी सवाल उठा रहे हैं.
लेकिन भारतीय एजेंसियों को श्रीलंका में संभावित हमलों और संदिग्धों के बारे में इतनी सटीक जानकारियां कैसे थी?
इसी साल श्रीलंका के एक दूर दराज के खेत में 100 किलो विस्फ़ोटक और गोला-बारूद की बरामदगी के बाद से नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) भारतीय और श्रीलंकाई एजेंसियों के रडार पर था.
स्वामी कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि यह इलाका कथित जेहादियों की ट्रेनिंग का मैदान था और यह एनटीजे देश के कुछ बौद्ध स्मारकों को उड़ाने की योजना बना रहा था.
सरीन कहते हैं कि किसी दूसरे देश के बारे में इतनी जानकारी हासिल करना ख़ुफ़िया विभाग के लिए कोई असमान्य बात नहीं है.
वो कहते हैं, "मैंने सुना है कि हाल ही में रॉ एक संदिग्ध से पूछताछ कर रहा था और उसी दौरान श्रीलंका में सीरियल धमाकों की जानकारी उसे मिली."
रॉ या कोई अन्य ख़ुफ़िया एजेंसियां अक्सर ऐसी सूचनाओं पर टिप्पणी नहीं करतीं. लेकिन यहां यह बात उल्लेखनीय है कि भारतीय और श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच संबंध विश्वास पर आधारित है.
तो क्या श्रीलंका चरमपंथी हमले की जांच में भारत को शामिल करेगा?
सरीन का मानना है कि सहयोग तो पहले से ही हो रहा है. हालांकि वो कहते हैं कि इसके बारे में मीडिया को कभी पता नहीं चल सकेगा.
बेशक श्रीलंकाई सरकार ने विदेशी शक्तियों से मदद मांगी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि रविवार को जो हमले हुए उसमें उसकी योजना बनाने और अंजाम देने में किसी विदेशी चरमपंथी संगठन का हाथ था या नहीं.
अमरीकी एफ़बीआई इसमें सहयोग कर रही है लेकिन भारत का नाम अभी तक सामने नहीं आया है.
सरीन के मुताबिक, "भारत के पास सटीक जानकारी है और जांच में उसकी भागीदारी अपेक्षित है. यह भारत के राष्ट्रीय हित में भी है."
हाल के दिनों में कई पड़ोसी देशों के साथ भारत का ख़ुफ़िया और सुरक्षा सहयोग पहले से अधिक मज़बूत हुआ है.
नरेंद्र मोदी सरकार ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के साथ सुरक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं.
सरीन कहते हैं, "70-80 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में रहते हैं उनमें से कुछ चरमपंथ विचारधारा के साथ सलफ़ी या कट्टर मुसलमान बन जाते हैं.
Thursday, April 11, 2019
राजस्थान का चेन्नई से मैच आज, घरेलू मैदान पर सुपरकिंग्स के खिलाफ 7 साल से अजेय
खेल डेस्क. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 12वें संस्करण का 25वां मुकाबला गुरुवार को सवाई मान सिंह स्टेडियम पर रात 8 बजे से राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपरकिंग्स के बीच खेला जाएगा। चेन्नई की टीम 6 में से 5 मैच जीतकर अंक तालिका में शीर्ष पर है। राजस्थान के सिर्फ 2 अंक है। वह अंक तालिका में 7वें नंबर पर है।
इस संस्करण में चेन्नई और राजस्थान दूसरी बार आमने-सामने होंगे। दोनों के बीच पहला मैच 31 मार्च को एमए चिदंबरम स्टेडियम पर हुआ था। उस मैच में चेन्नई ने 8 रन से जीत हासिल की थी।
घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ राजस्थान का सक्सेस रेट 67%
राजस्थान का घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ रिकॉर्ड बेहतर है। जयपुर में दोनों के बीच अब तक 6 मैच खेले गए हैं। इनमें से अजिंक्य रहाणे के नेतृत्व वाली राजस्थान ने 4 में जीत हासिल की है, जबकि चेन्नई को सिर्फ 2 मुकाबलों में ही सफलता मिली है।
चेन्नई सुपरकिंग्स को जयपुर में राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ आखिरी जीत 10 मई 2012 को मिली थी। तब उसने सुपरकिंग्स को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से इस मैदान पर दोनों के बीच 3 मैच हुए। तीनों को राजस्थान की टीम जीतने में सफल रही।
आईपीएल में दोनों के बीच अब तक 21 मैच हुए हैं। इनमें से चेन्नई ने 13 और राजस्थान ने 8 मैच जीते हैं। दोनों के बीच आखिरी 5 मुकाबलों की बात करें तो राजस्थान 2 को जीतने में सफल रही है, जबकि 3 में उसे महेंद्र सिंह धोनी की अगुआई वाली चेन्नई से हार का सामना करना पड़ा है।
राजस्थान ने चेन्नई के खिलाफ आखिरी जीत पिछले साल 11 मई को हासिल की थी। सवाई मान सिंह स्टेडियम पर हुए उस मुकाबले में राजस्थान ने चेन्नई को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से दोनों के बीच एक मैच हुआ, जिसे चेन्नई की टीम जीतने में सफल रही।
चेन्नई के गेंदबाज इस समय शानदार गेंदबाजी कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिछले मुकाबले में कोलकाता को 108 रन पर ही रोक दिया था। तेज गेंदबाज दीपक चाहर के साथ अनुभवी हरभजन सिंह और इमरान ताहिर भी बेहतरीन गेंदबाजी कर रहे हैं।
रायडू के फॉर्म में लौटने की उम्मीद
बल्लेबाजी में अंबाती रायडू फॉर्म में लौटना चाहेंगे। उनको छोड़कर फाफ डुप्लेसिस, शेन वॉटसन शानदार फॉर्म में चल रहे हैं। डेथ ओवर्स में महेंद्र सिंह धोनी की तेज बल्लेबाजी अन्य खिलाड़ियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर रही है।
राजस्थान की बल्लेबाजी ज्यादातर जोस बटलर और अजिंक्य रहाणे पर टिकी है। युवा बल्लेबाज संजू सैमसन ने एक मैच में शतक जरूर लगाया था, लेकिन उसके बाद से वे अपने उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाए हैं। इसके अलावा स्टीव स्मिथ और बेन स्टोक्स को भी चेन्नई के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत है।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
राजस्थान रॉयल्स : अजिंक्य रहाणे (कप्तान), कृष्णप्पा गौतम, संजू सैमसन, श्रेयस गोपाल, आर्यमान बिड़ला, एस. मिधुन, प्रशांत चोपड़ा, स्टुअर्ट बिन्नी, राहुल त्रिपाठी, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ, जोस बटलर, जोफरा आर्चर, ईश सोढ़ी, धवल कुलकर्णी, महिपाल लोमरोर, जयदेव उनादकट, वरुण एरॉन, ओशेन थॉमस, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, शुभम रंजाने, मनन वोहरा, एश्टन टर्नर, रियान पराग।
इस संस्करण में चेन्नई और राजस्थान दूसरी बार आमने-सामने होंगे। दोनों के बीच पहला मैच 31 मार्च को एमए चिदंबरम स्टेडियम पर हुआ था। उस मैच में चेन्नई ने 8 रन से जीत हासिल की थी।
घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ राजस्थान का सक्सेस रेट 67%
राजस्थान का घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ रिकॉर्ड बेहतर है। जयपुर में दोनों के बीच अब तक 6 मैच खेले गए हैं। इनमें से अजिंक्य रहाणे के नेतृत्व वाली राजस्थान ने 4 में जीत हासिल की है, जबकि चेन्नई को सिर्फ 2 मुकाबलों में ही सफलता मिली है।
चेन्नई सुपरकिंग्स को जयपुर में राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ आखिरी जीत 10 मई 2012 को मिली थी। तब उसने सुपरकिंग्स को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से इस मैदान पर दोनों के बीच 3 मैच हुए। तीनों को राजस्थान की टीम जीतने में सफल रही।
आईपीएल में दोनों के बीच अब तक 21 मैच हुए हैं। इनमें से चेन्नई ने 13 और राजस्थान ने 8 मैच जीते हैं। दोनों के बीच आखिरी 5 मुकाबलों की बात करें तो राजस्थान 2 को जीतने में सफल रही है, जबकि 3 में उसे महेंद्र सिंह धोनी की अगुआई वाली चेन्नई से हार का सामना करना पड़ा है।
राजस्थान ने चेन्नई के खिलाफ आखिरी जीत पिछले साल 11 मई को हासिल की थी। सवाई मान सिंह स्टेडियम पर हुए उस मुकाबले में राजस्थान ने चेन्नई को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से दोनों के बीच एक मैच हुआ, जिसे चेन्नई की टीम जीतने में सफल रही।
चेन्नई के गेंदबाज इस समय शानदार गेंदबाजी कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिछले मुकाबले में कोलकाता को 108 रन पर ही रोक दिया था। तेज गेंदबाज दीपक चाहर के साथ अनुभवी हरभजन सिंह और इमरान ताहिर भी बेहतरीन गेंदबाजी कर रहे हैं।
रायडू के फॉर्म में लौटने की उम्मीद
बल्लेबाजी में अंबाती रायडू फॉर्म में लौटना चाहेंगे। उनको छोड़कर फाफ डुप्लेसिस, शेन वॉटसन शानदार फॉर्म में चल रहे हैं। डेथ ओवर्स में महेंद्र सिंह धोनी की तेज बल्लेबाजी अन्य खिलाड़ियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर रही है।
राजस्थान की बल्लेबाजी ज्यादातर जोस बटलर और अजिंक्य रहाणे पर टिकी है। युवा बल्लेबाज संजू सैमसन ने एक मैच में शतक जरूर लगाया था, लेकिन उसके बाद से वे अपने उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाए हैं। इसके अलावा स्टीव स्मिथ और बेन स्टोक्स को भी चेन्नई के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत है।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
राजस्थान रॉयल्स : अजिंक्य रहाणे (कप्तान), कृष्णप्पा गौतम, संजू सैमसन, श्रेयस गोपाल, आर्यमान बिड़ला, एस. मिधुन, प्रशांत चोपड़ा, स्टुअर्ट बिन्नी, राहुल त्रिपाठी, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ, जोस बटलर, जोफरा आर्चर, ईश सोढ़ी, धवल कुलकर्णी, महिपाल लोमरोर, जयदेव उनादकट, वरुण एरॉन, ओशेन थॉमस, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, शुभम रंजाने, मनन वोहरा, एश्टन टर्नर, रियान पराग।
Wednesday, April 3, 2019
विपक्ष विहीन तेलंगाना! ‘भाग्य नगर’ का वादा यहां भाजपा का दुर्भाग्य न बन जाए
शशिभूषण, हैदराबाद. हैदराबाद के चारमीनार इलाके में जिससे भी पूछिए, एक ही जवाब मिलेगा- यहां तो बस एक ही है साहब। एक मतलब! असगर अली पास की मक्का मस्जिद की ओर इशारा करता है, कहता है वहीं बम फटे थे। लेकिन, वह इतिहास है। अब यह अमन का इलाका है, लोग ‘पतंग’ उड़ाते हैं। दरअसल ‘पतंग’ ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का चुनाव चिह्न है।
मध्य तेलंगाना का यह संसदीय क्षेत्र एआईएमआईएम का अजेय दुर्ग है। सीट 1984 से ओवैसी परिवार के पास है। पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी लगातार छह बार सांसद चुने गए। 2004 से बेटे असदउद्दीन ओवैसी ने विरासत संभाली। ओवैसी फिर मैदान में है। नामांकन बड़े भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी किया है। मौजम शाही मार्केट के सुलेमान आतिफ की नजर में यह एहतियाती कदम है। अकबरुद्दीन संसदीय क्षेत्र की चंद्रयानगुट्टा विधानसभा सीट से लगातार पांचवी बार विधायक हैं।
एआईएमआईएम हैदराबाद को सांप्रदायिक मेलजोल की मिसाल बताती है। विधानसभा में उसके सात विधायक हैं। अकेले छह हैदराबाद संसदीय क्षेत्र की सीटों से। सातवीं सीट घोषामहल भाजपा के पास है। विधानसभा चुनाव में यही इकलौती सीट भाजपा ने जीती थी। हैदराबाद में मुस्लिम आबादी 65% से अधिक है। भाजपा उम्मीदवार भगवंत राव 2014 में भी उम्मीदवार थे। तब उन्हें 32% वोट मिले थे। यह भाजपा का अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन था। टीआरएस ने पी. श्रीकांत को टिकट दिया है। हार्डवेयर के थोक कारोबारी सोनू की नजर में श्रीकांत की मौजूदगी ओवैसी के लिए फायदेमंद ही है।
हैदराबाद संसदीय क्षेत्र से मलकाजगिरी, सिकंदराबाद, चेलवेल्ला संसदीय क्षेत्रों की सीमा जुड़ती है। टीआरएस ने इन सीटों को प्राथमिकता में रखा है। ये सभी सीटें शहरी हैं। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के पुत्र और टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष के.तारक रामाराव (केटीआर) सीधे मॉनीटरिंग कर रहे हैं। मोदी लहर में भाजपा ने सिकंदराबाद सीट जीती थी। सांसद बंडारू दत्तात्रेय की जगह इस बार किशन रेड्डी को टिकट दिया है। रेड्डी, अंबरपेट विधानसभा सीट से महज एक हजार मतों से चुनाव हारे थे। भाजपा को सीट बचाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।
चेलवेल्ला से बी जर्नादन रेड्डी भाजपा और जी. रंजीत रेड्डी टीआरएस प्रत्याशी हैं। कांग्रेस के एस. जयपाल रेड्डी यहां से सांसद रह चुके हैं। यह आईटी हब है। के. विशेश्वर रेड्डी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। 2014 का चुनाव उन्होंने टीआरएस के टिकट पर जीता था पर विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस और टीआरएस प्रत्याशी धनाढ़य हैं। सात विधानसभा क्षेत्रों में से दो कांग्रेस के पास है। सीट पर मुकाबला कांटे का होगा।
देश की सबसे ज्यादा मतदाताओं वाली सीट (31.83 लाख) मलकाजगिरी का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता हर बार सांसद बदल देते हैं। मतदाताओं में बड़ी संख्या पूर्व सीमांध्र के लोगों की है। सांसद सी. मल्ला रेड्डी विधायक भी हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी। विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने संसदीय क्षेत्र की दो विधानसभा सीटें 70 और चार 40 हजार से अधिक के अंतर से जीती थीं।
एलबी नगर की सातवीं सीट से जीते कांग्रेस के सुधीर रेड्डी अब टीआरएस के हो गए हैं। एन रामचंद्र राव भाजपा प्रत्याशी हैं। टीआरएस ने एम राजशेखर रेड्डी को उतारा है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ए रेवंत रेड्डी को भाकपा का भी समर्थन है। रेवंत कहते हैं- यह राज्य नहीं, राष्ट्र का चुनाव है। राष्ट्र के चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका नहीं होती है। टीआरएस मुख्यालय के प्रभारी व एमएलसी प्रो. एम श्रीनिवास रेड्डी कहते है-हम न तो कांग्रेस के साथ हैं, न भाजपा के। हम फेडरल फ्रंट चाहते हैं। इसमें हमारी भूमिका होगी। सभी सीटें जीतेंगे।
टीआरएस के दावों पर भाजपा नेता बंडारू दत्तात्रेय कहते हैं, 16 सीटों पर चुनाव लड़ने वाला दल राष्ट्रीय राजनीति की बात करे, यह सबसे बड़ा मजाक है। राजनीतिक विश्लेषक डीपी सिंह के अनुसार, राज्य गठन में टीआरएस की भूमिका लोग भूले नहीं हैं। केसीआर ने हर वर्ग के लिए कारगर स्कीम चलाई हैं। लोकसभा में भी फायदा होगा। केसीआर ने राज्य को विपक्षविहीन कर दिया है। पद्मजा शॉ कहती हैं कि राज्य में लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में हो रहा है। दलबदल कानून प्रासंगिकता खो चुका है। हालात सत्ताधारी दल (राज्य) के पक्ष में हैं। समाजशास्त्री कल्पना कन्नाबीरन कहती हैं कि तेलंगाना में विपक्ष है ही नहीं। कांग्रेस कमजोर है।
भाजपा का भविष्य तो बीते विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने ही बिगाड़ दिया, जब वह हैदराबाद का नाम भाग्यनगर करने की बात कह गए थे। वैसे भी केसीआर ने भाजपा के लिए जमीन छोड़ी ही नहीं है। यज्ञ, पूजा-पाठ, तिरंगा, राष्ट्रगान केसीआर का ही एजेंडा है। द हिन्दू की पत्रकार निखिला हेनरी कहती हैं कि चुनाव में पैसे का खूब खेल होता है। इसीलिए आयोग ने राज्य को कैश सेंसेटिव सूची में भी रखा है। चुनाव में फिलहाल टीआरएस ही आगे है। दूसरी ताकत कांग्रेस है लेकिन वह विधायक खोती जा रही है।
मध्य तेलंगाना का यह संसदीय क्षेत्र एआईएमआईएम का अजेय दुर्ग है। सीट 1984 से ओवैसी परिवार के पास है। पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी लगातार छह बार सांसद चुने गए। 2004 से बेटे असदउद्दीन ओवैसी ने विरासत संभाली। ओवैसी फिर मैदान में है। नामांकन बड़े भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी किया है। मौजम शाही मार्केट के सुलेमान आतिफ की नजर में यह एहतियाती कदम है। अकबरुद्दीन संसदीय क्षेत्र की चंद्रयानगुट्टा विधानसभा सीट से लगातार पांचवी बार विधायक हैं।
एआईएमआईएम हैदराबाद को सांप्रदायिक मेलजोल की मिसाल बताती है। विधानसभा में उसके सात विधायक हैं। अकेले छह हैदराबाद संसदीय क्षेत्र की सीटों से। सातवीं सीट घोषामहल भाजपा के पास है। विधानसभा चुनाव में यही इकलौती सीट भाजपा ने जीती थी। हैदराबाद में मुस्लिम आबादी 65% से अधिक है। भाजपा उम्मीदवार भगवंत राव 2014 में भी उम्मीदवार थे। तब उन्हें 32% वोट मिले थे। यह भाजपा का अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन था। टीआरएस ने पी. श्रीकांत को टिकट दिया है। हार्डवेयर के थोक कारोबारी सोनू की नजर में श्रीकांत की मौजूदगी ओवैसी के लिए फायदेमंद ही है।
हैदराबाद संसदीय क्षेत्र से मलकाजगिरी, सिकंदराबाद, चेलवेल्ला संसदीय क्षेत्रों की सीमा जुड़ती है। टीआरएस ने इन सीटों को प्राथमिकता में रखा है। ये सभी सीटें शहरी हैं। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के पुत्र और टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष के.तारक रामाराव (केटीआर) सीधे मॉनीटरिंग कर रहे हैं। मोदी लहर में भाजपा ने सिकंदराबाद सीट जीती थी। सांसद बंडारू दत्तात्रेय की जगह इस बार किशन रेड्डी को टिकट दिया है। रेड्डी, अंबरपेट विधानसभा सीट से महज एक हजार मतों से चुनाव हारे थे। भाजपा को सीट बचाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।
चेलवेल्ला से बी जर्नादन रेड्डी भाजपा और जी. रंजीत रेड्डी टीआरएस प्रत्याशी हैं। कांग्रेस के एस. जयपाल रेड्डी यहां से सांसद रह चुके हैं। यह आईटी हब है। के. विशेश्वर रेड्डी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। 2014 का चुनाव उन्होंने टीआरएस के टिकट पर जीता था पर विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस और टीआरएस प्रत्याशी धनाढ़य हैं। सात विधानसभा क्षेत्रों में से दो कांग्रेस के पास है। सीट पर मुकाबला कांटे का होगा।
देश की सबसे ज्यादा मतदाताओं वाली सीट (31.83 लाख) मलकाजगिरी का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता हर बार सांसद बदल देते हैं। मतदाताओं में बड़ी संख्या पूर्व सीमांध्र के लोगों की है। सांसद सी. मल्ला रेड्डी विधायक भी हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी। विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने संसदीय क्षेत्र की दो विधानसभा सीटें 70 और चार 40 हजार से अधिक के अंतर से जीती थीं।
एलबी नगर की सातवीं सीट से जीते कांग्रेस के सुधीर रेड्डी अब टीआरएस के हो गए हैं। एन रामचंद्र राव भाजपा प्रत्याशी हैं। टीआरएस ने एम राजशेखर रेड्डी को उतारा है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ए रेवंत रेड्डी को भाकपा का भी समर्थन है। रेवंत कहते हैं- यह राज्य नहीं, राष्ट्र का चुनाव है। राष्ट्र के चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका नहीं होती है। टीआरएस मुख्यालय के प्रभारी व एमएलसी प्रो. एम श्रीनिवास रेड्डी कहते है-हम न तो कांग्रेस के साथ हैं, न भाजपा के। हम फेडरल फ्रंट चाहते हैं। इसमें हमारी भूमिका होगी। सभी सीटें जीतेंगे।
टीआरएस के दावों पर भाजपा नेता बंडारू दत्तात्रेय कहते हैं, 16 सीटों पर चुनाव लड़ने वाला दल राष्ट्रीय राजनीति की बात करे, यह सबसे बड़ा मजाक है। राजनीतिक विश्लेषक डीपी सिंह के अनुसार, राज्य गठन में टीआरएस की भूमिका लोग भूले नहीं हैं। केसीआर ने हर वर्ग के लिए कारगर स्कीम चलाई हैं। लोकसभा में भी फायदा होगा। केसीआर ने राज्य को विपक्षविहीन कर दिया है। पद्मजा शॉ कहती हैं कि राज्य में लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में हो रहा है। दलबदल कानून प्रासंगिकता खो चुका है। हालात सत्ताधारी दल (राज्य) के पक्ष में हैं। समाजशास्त्री कल्पना कन्नाबीरन कहती हैं कि तेलंगाना में विपक्ष है ही नहीं। कांग्रेस कमजोर है।
भाजपा का भविष्य तो बीते विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने ही बिगाड़ दिया, जब वह हैदराबाद का नाम भाग्यनगर करने की बात कह गए थे। वैसे भी केसीआर ने भाजपा के लिए जमीन छोड़ी ही नहीं है। यज्ञ, पूजा-पाठ, तिरंगा, राष्ट्रगान केसीआर का ही एजेंडा है। द हिन्दू की पत्रकार निखिला हेनरी कहती हैं कि चुनाव में पैसे का खूब खेल होता है। इसीलिए आयोग ने राज्य को कैश सेंसेटिव सूची में भी रखा है। चुनाव में फिलहाल टीआरएस ही आगे है। दूसरी ताकत कांग्रेस है लेकिन वह विधायक खोती जा रही है।
Thursday, March 21, 2019
रामगोपाल यादव ने कहा- पुलवामा में वोट के लिए जवान मार दिए गए, सरकार बदलने पर जांच होगी
इटावा. समाजवादी पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव ने पुलवामा हमले को साजिश करार दिया। उन्हाेंने कहा- पैरा मिलिट्री फोर्सेस इस सरकार (भाजपा सरकार) में दुखी हैं। वोट की खातिर जवान मार दिए गए। जब सरकार बदलेगी तब इस प्रकरण की जांच होगी और बड़े-बड़े लोग फंसेंगे।
रामगोपाल ने कहा, ''जम्मू-कश्मीर के बीच चेकिंग नहीं थी। जवानों को साधारण बस में भेज दिया गया। यह साजिश है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि यदि नेता जी (मुलायम सिंह यादव) के द्वारा लाए गए हवाई जहाजों का इस्तेमाल सीमा पर हुआ होता तो आज पाकिस्तान सामना नहीं कर पाता।
माफी मांगें राम गोपाल यादव: योगी
उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, रामगोपाल का बयान घटिया राजनीति का भद्दा उदाहरण है। उन्हें सीआरपीएफ जवानों की शहादत पर प्रश्न खड़ा करने और देश के जवानों का मनोबल तोड़ने वाले इस बयान के लिए जनता से माफी मांगनी चाहिए।
हिंदुत्व का सर्टिफिकेट देने वाली पार्टी बनी भाजपा
अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "कब कौन चाय वाला बन गया और वही चाय वाला चौकीदार बन गया। भाजपा सर्टिफिकेट देने वाली पार्टी बन गई है। हिंदू और राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट भाजपा देती है।"
टीवी देखना बंद कर दें- अखिलेश
अखिलेश यादव ने कहा, "अगर आपको भटकने से बचना है तो आप लोग टीवी देखना बन्द कर दो। न्यूज चैनल देखना बन्द कर दो।" उन्होंने कहा कि हमारा गठबंधन बसपा से हो चुका है और देश में गठबंधन की स्थिति बहुत मजबूत है। आमचुनाव में जीत दर्ज कर गठबंधन सरकार बनाएगा।
14 फरवरी को हुआ था पुलवामा अटैक
14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर फिदायीन हमले में 40 जवान शहीद हुए थे। काफिले में एक आतंकी आरडीएक्स के साथ कार में सवार होकर घुस आया था और बस में टक्कर कर विस्फोट किया था। हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने ली थी। हमले के ठीक 13वें दिन भारतीय वायुसेना ने पाकस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राक की थी और जैश के ठिकानों को तबाह कर दिया था।
शिवपाल बोले- हम गठबंधन में शामिल होना चाहते थे
वहीं, शिवपाल यादव ने कहा है कि आज होली के अवसर पर नेताजी की कोठी पर आकर उनका अशीर्वाद लिया है। आगामी लोकसभा चुनाव में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अच्छी सीटें जीत रही है। हमने बहुत प्रयास किया था, लेकिन गठबंधन में हमें शामिल नहीं किया गया। कांग्रेस से गठबंधन करने का प्रयास किया था, लेकिन कांग्रेस ने भी हमसे गठबंधन नहीं किया। हमारी पार्टी पीस पार्टी समेत 50 छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुकी है। उन्ही के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगें।
रामगोपाल ने कहा, ''जम्मू-कश्मीर के बीच चेकिंग नहीं थी। जवानों को साधारण बस में भेज दिया गया। यह साजिश है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि यदि नेता जी (मुलायम सिंह यादव) के द्वारा लाए गए हवाई जहाजों का इस्तेमाल सीमा पर हुआ होता तो आज पाकिस्तान सामना नहीं कर पाता।
माफी मांगें राम गोपाल यादव: योगी
उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, रामगोपाल का बयान घटिया राजनीति का भद्दा उदाहरण है। उन्हें सीआरपीएफ जवानों की शहादत पर प्रश्न खड़ा करने और देश के जवानों का मनोबल तोड़ने वाले इस बयान के लिए जनता से माफी मांगनी चाहिए।
हिंदुत्व का सर्टिफिकेट देने वाली पार्टी बनी भाजपा
अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "कब कौन चाय वाला बन गया और वही चाय वाला चौकीदार बन गया। भाजपा सर्टिफिकेट देने वाली पार्टी बन गई है। हिंदू और राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट भाजपा देती है।"
टीवी देखना बंद कर दें- अखिलेश
अखिलेश यादव ने कहा, "अगर आपको भटकने से बचना है तो आप लोग टीवी देखना बन्द कर दो। न्यूज चैनल देखना बन्द कर दो।" उन्होंने कहा कि हमारा गठबंधन बसपा से हो चुका है और देश में गठबंधन की स्थिति बहुत मजबूत है। आमचुनाव में जीत दर्ज कर गठबंधन सरकार बनाएगा।
14 फरवरी को हुआ था पुलवामा अटैक
14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर फिदायीन हमले में 40 जवान शहीद हुए थे। काफिले में एक आतंकी आरडीएक्स के साथ कार में सवार होकर घुस आया था और बस में टक्कर कर विस्फोट किया था। हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने ली थी। हमले के ठीक 13वें दिन भारतीय वायुसेना ने पाकस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राक की थी और जैश के ठिकानों को तबाह कर दिया था।
शिवपाल बोले- हम गठबंधन में शामिल होना चाहते थे
वहीं, शिवपाल यादव ने कहा है कि आज होली के अवसर पर नेताजी की कोठी पर आकर उनका अशीर्वाद लिया है। आगामी लोकसभा चुनाव में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अच्छी सीटें जीत रही है। हमने बहुत प्रयास किया था, लेकिन गठबंधन में हमें शामिल नहीं किया गया। कांग्रेस से गठबंधन करने का प्रयास किया था, लेकिन कांग्रेस ने भी हमसे गठबंधन नहीं किया। हमारी पार्टी पीस पार्टी समेत 50 छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुकी है। उन्ही के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगें।
Thursday, March 7, 2019
रफ़ाल के दस्तावेज़ कहां से मिले, ब्रह्मांड की कोई ताक़त मुझसे नहीं जान सकती- एन राम
भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि 'द हिन्दू' अख़बार के ख़िलाफ़ गोपनीयता के क़ानून के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है.
केंद्र सरकार का कहना है कि फ़्रांस से 36 लड़ाकू विमानों की ख़रीद से जुड़े दस्तावेज़ रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं और इसी के आधार पर 'द हिन्दू' ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है.
वेणुगोपाल ने कोर्ट में कहा है कि 'द हिन्दू' ने जिन दस्तावेज़ों को प्रकाशित किया है उस आधार पर रफ़ाल सौदे की जांच नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये सरकार की गोपनीय फ़ाइलें हैं.
'द हिन्दू पब्लिशिंग ग्रुप' के चेयरमैन एन राम के नाम से रफ़ाल सौदे पर कई रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. एन राम का कहना है कि उन्होंने जनहित में ये रिपोर्टें प्रकाशित की हैं.
एन राम ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, ''इसमें कुछ भी परेशानी की बात नहीं है. जो प्रासंगिक था उसे हमने प्रकाशित किया है और मैं इसके साथ पूरी तरह से खड़ा हूं.
भारत ने अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण प्रोग्राम के तहत फ़्रांस की दसो कंपनी से 8.7 अरब डॉलर में 36 रफ़ाल लड़ाकू विमानों का सौदा किया था.
एन राम ने कहा है, ''हमने रक्षा मंत्रालय से दस्तावेज़ चुराए नहीं हैं. हमें ये दस्तावेज़ गोपनीय सूत्रों से मिले हैं और इस ब्रह्मांड में कोई ऐसी ताक़त नहीं है जो मुझे यह कहने पर मजबूर कर सके कि दस्तावेज किसने दिए हैं. हमने जिन दस्तावेज़ों के आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की है वो जनहित में हमारी खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है. रफ़ाल सौदे की अहम सूचनाओं को दबाकर रखा गया जबकि संसद से लेकर सड़क तक इसे जारी करने की मांग होती रही.''
एन राम का कहना है कि उन्होंने जो भी प्रकाशित किया है, उसका अधिकार 'संविधान के अनुच्छेद 19 (1) से मिला है.' राम ने कहा कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार का हिस्सा है. एन राम ने कहा कि राष्ट्र सुरक्षा और उसके हितों से समझौते का कोई सवाल ही खड़ा नहीं होता है.
एन राम ने ये भी कहा कि लोकतांत्रिक भारत को 1923 के औपनिवेशिक गोपनीयता के क़ानून से अलग होने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, ''गोपनीयता का क़ानून औपनिवेशिक क़ानून है और यह ग़ैर-लोकतांत्रिक है. स्वतंत्र भारत में शायद ही किसी प्रकाशन के ख़िलाफ़ इस क़ानून का इस्तेमाल किया गया हो. अगर किसी तरह की जासूसी हो रही हो तो वो अलग बात है. हमने जो छापा है वो जनहित में है.''
एन राम का कहना है कि अटॉर्नी जनरल के तर्क को माना जाए तो इससे खोजी पत्रकारिता पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.
राम ने कहा, ''ये केवल हिन्दू का मामला नहीं है. अन्य स्वतंत्र प्रकाशकों के लिए भी ख़तरनाक है. 1980 के दशक में हमने बोफ़ोर्स की जांच में अहम भूमिका अदा की थी. इस सरकार में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर डर बढ़ा है. भारतीय मीडिया को इसे लेकर बहुत कुछ करने की ज़रूरत है.''
पूरे विवाद पर वरिष्ठ पत्रकार और द हिन्दू में एन राम के साथ काम कर चुके प्रवीण स्वामी ने ट्वीट कर कहा है, ''19 साल पहले फ़्रंटलाइन में इस रिपोर्ट (करगिल संघर्ष पर की गई रिपोर्ट) के कारण मुझे गोपनीयता के क़ानून के तहत धमकियां मिली थीं. तब मेरे साथ एन राम खड़े थे. आज उसे याद करते हुए एन राम के प्रति मेरे मन आदर और बढ़ गया है.''
सुप्रीम कोर्ट में रफ़ाल मामले पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई में बुधवार को एटॉर्नी जनरल (एजी) केके वेणुगोपाल ने कहा था कि इस लड़ाकू विमान के सौदे से जुड़े कुछ ख़ास दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण ने जब एक नोट पढ़ना शुरू किया तो वेणुगोपाल ने आपत्ति जताई थी. भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि रफ़ाल सौदे से जुड़ी जांच की पुनर्विचार याचिका ख़ारिज नहीं करनी चाहिए क्योंकि 'अहम तथ्यों' को सरकार दबा नहीं सकती है.
रफ़ाल पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ़ की बेंच के सामने वेणुगोपाल ने कहा था कि रक्षा मंत्रालय से नौकरशाहों ने ऐसे दस्तावेज चुरा लिए हैं जिसकी जांच अभी लंबित है.
सुनवाई के दौरान मौजूद वरिष्ठ क़ानूनी संवाददाता के सुचित्रा मोहंती अनुसार एजी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि गोपनीयता के क़ानून के अनुसार चोरी करने वालों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है.
एजी से जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा कि सरकार ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है तो वेणुगोपाल ने कहा था, ''हमलोग इसकी जांच कर रहे हैं कि फ़ाइल चोरी कैसे हुई. एजी ने कहा कि द हिन्दू ने गोपनीय फ़ाइल को छापा है. हाल ही में द हिन्दू ने रफ़ाल सौदे से जुड़ी कई रिपोर्ट छापी हैं जिनमें बताया गया है कि सरकार ने कई नियमों का उल्लंघन किया है.''
वेणुगोपाल ने कहा था कि रक्षा सौदों का संबंध राष्ट्र की सुरक्षा से होता है और ये काफ़ी संवेदनशील हैं. एजी ने कहा था कि अगर सब कुछ मीडिया, कोर्ट और पब्लिक डिबेट में आएगा तो दूसरे देश सौदा करने से बचेंगे.
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो अदालत में वही दस्तावेज रख रहे हैं जो सार्वजनिक रूप से पहले से ही मौजूद हैं.
एजी ने पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने के पक्ष में दलील देते हुए कहा था कि सेक्शन तीन के उपनियम सी के अनुसार अगर कोई व्यक्ति वैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है, जिनका संबंध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संप्रभुता, एकता और विदेशी संबंधों से है तो यह ग़ैरक़ानूनी है. एजी ने सुप्रीम कोर्ट से गोपनीयता के क़ानून के उल्लंघन का हवाला देते हुए पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने की मांग की है.
केंद्र सरकार का कहना है कि फ़्रांस से 36 लड़ाकू विमानों की ख़रीद से जुड़े दस्तावेज़ रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं और इसी के आधार पर 'द हिन्दू' ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है.
वेणुगोपाल ने कोर्ट में कहा है कि 'द हिन्दू' ने जिन दस्तावेज़ों को प्रकाशित किया है उस आधार पर रफ़ाल सौदे की जांच नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये सरकार की गोपनीय फ़ाइलें हैं.
'द हिन्दू पब्लिशिंग ग्रुप' के चेयरमैन एन राम के नाम से रफ़ाल सौदे पर कई रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. एन राम का कहना है कि उन्होंने जनहित में ये रिपोर्टें प्रकाशित की हैं.
एन राम ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, ''इसमें कुछ भी परेशानी की बात नहीं है. जो प्रासंगिक था उसे हमने प्रकाशित किया है और मैं इसके साथ पूरी तरह से खड़ा हूं.
भारत ने अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण प्रोग्राम के तहत फ़्रांस की दसो कंपनी से 8.7 अरब डॉलर में 36 रफ़ाल लड़ाकू विमानों का सौदा किया था.
एन राम ने कहा है, ''हमने रक्षा मंत्रालय से दस्तावेज़ चुराए नहीं हैं. हमें ये दस्तावेज़ गोपनीय सूत्रों से मिले हैं और इस ब्रह्मांड में कोई ऐसी ताक़त नहीं है जो मुझे यह कहने पर मजबूर कर सके कि दस्तावेज किसने दिए हैं. हमने जिन दस्तावेज़ों के आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की है वो जनहित में हमारी खोजी पत्रकारिता का हिस्सा है. रफ़ाल सौदे की अहम सूचनाओं को दबाकर रखा गया जबकि संसद से लेकर सड़क तक इसे जारी करने की मांग होती रही.''
एन राम का कहना है कि उन्होंने जो भी प्रकाशित किया है, उसका अधिकार 'संविधान के अनुच्छेद 19 (1) से मिला है.' राम ने कहा कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना के अधिकार का हिस्सा है. एन राम ने कहा कि राष्ट्र सुरक्षा और उसके हितों से समझौते का कोई सवाल ही खड़ा नहीं होता है.
एन राम ने ये भी कहा कि लोकतांत्रिक भारत को 1923 के औपनिवेशिक गोपनीयता के क़ानून से अलग होने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, ''गोपनीयता का क़ानून औपनिवेशिक क़ानून है और यह ग़ैर-लोकतांत्रिक है. स्वतंत्र भारत में शायद ही किसी प्रकाशन के ख़िलाफ़ इस क़ानून का इस्तेमाल किया गया हो. अगर किसी तरह की जासूसी हो रही हो तो वो अलग बात है. हमने जो छापा है वो जनहित में है.''
एन राम का कहना है कि अटॉर्नी जनरल के तर्क को माना जाए तो इससे खोजी पत्रकारिता पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.
राम ने कहा, ''ये केवल हिन्दू का मामला नहीं है. अन्य स्वतंत्र प्रकाशकों के लिए भी ख़तरनाक है. 1980 के दशक में हमने बोफ़ोर्स की जांच में अहम भूमिका अदा की थी. इस सरकार में मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर डर बढ़ा है. भारतीय मीडिया को इसे लेकर बहुत कुछ करने की ज़रूरत है.''
पूरे विवाद पर वरिष्ठ पत्रकार और द हिन्दू में एन राम के साथ काम कर चुके प्रवीण स्वामी ने ट्वीट कर कहा है, ''19 साल पहले फ़्रंटलाइन में इस रिपोर्ट (करगिल संघर्ष पर की गई रिपोर्ट) के कारण मुझे गोपनीयता के क़ानून के तहत धमकियां मिली थीं. तब मेरे साथ एन राम खड़े थे. आज उसे याद करते हुए एन राम के प्रति मेरे मन आदर और बढ़ गया है.''
सुप्रीम कोर्ट में रफ़ाल मामले पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई में बुधवार को एटॉर्नी जनरल (एजी) केके वेणुगोपाल ने कहा था कि इस लड़ाकू विमान के सौदे से जुड़े कुछ ख़ास दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण ने जब एक नोट पढ़ना शुरू किया तो वेणुगोपाल ने आपत्ति जताई थी. भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि रफ़ाल सौदे से जुड़ी जांच की पुनर्विचार याचिका ख़ारिज नहीं करनी चाहिए क्योंकि 'अहम तथ्यों' को सरकार दबा नहीं सकती है.
रफ़ाल पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ़ की बेंच के सामने वेणुगोपाल ने कहा था कि रक्षा मंत्रालय से नौकरशाहों ने ऐसे दस्तावेज चुरा लिए हैं जिसकी जांच अभी लंबित है.
सुनवाई के दौरान मौजूद वरिष्ठ क़ानूनी संवाददाता के सुचित्रा मोहंती अनुसार एजी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि गोपनीयता के क़ानून के अनुसार चोरी करने वालों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है.
एजी से जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा कि सरकार ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है तो वेणुगोपाल ने कहा था, ''हमलोग इसकी जांच कर रहे हैं कि फ़ाइल चोरी कैसे हुई. एजी ने कहा कि द हिन्दू ने गोपनीय फ़ाइल को छापा है. हाल ही में द हिन्दू ने रफ़ाल सौदे से जुड़ी कई रिपोर्ट छापी हैं जिनमें बताया गया है कि सरकार ने कई नियमों का उल्लंघन किया है.''
वेणुगोपाल ने कहा था कि रक्षा सौदों का संबंध राष्ट्र की सुरक्षा से होता है और ये काफ़ी संवेदनशील हैं. एजी ने कहा था कि अगर सब कुछ मीडिया, कोर्ट और पब्लिक डिबेट में आएगा तो दूसरे देश सौदा करने से बचेंगे.
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो अदालत में वही दस्तावेज रख रहे हैं जो सार्वजनिक रूप से पहले से ही मौजूद हैं.
एजी ने पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने के पक्ष में दलील देते हुए कहा था कि सेक्शन तीन के उपनियम सी के अनुसार अगर कोई व्यक्ति वैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है, जिनका संबंध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संप्रभुता, एकता और विदेशी संबंधों से है तो यह ग़ैरक़ानूनी है. एजी ने सुप्रीम कोर्ट से गोपनीयता के क़ानून के उल्लंघन का हवाला देते हुए पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने की मांग की है.
Thursday, February 28, 2019
क्या अमेरिका की तरह मसूद अजहर को मार गिराएगा भारत?
भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक के बाद से ही पाकिस्तान बौखलाया हुआ है और अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है. बुधवार सुबह पाकिस्तान ने ये फिर सिद्ध कर दिया कि अगर भारत अपनी आत्मरक्षा के लिए आतंकवादियों का सफाया करेगा तो पाकिस्तान उन आतंकवादियों को बचाने के लिए भारतीय फौजी और मासूम नागरिकों को निशाना बनाएगा. पाकिस्तान की कायराना हरकत के बाद से केंद्र सरकार सक्रिय हो चुकी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि अगर अमेरिका ओसामा को मार सकता है तो भारत भी मसूद अजहर को पाकिस्तान में ही मार गिराने की क्षमता रखता है. इतने बड़े बयान के बाद ये जानना जरूरी हो जाता है कि अमेरिका ने 2011 में किस तरीके से ओसामा के आतंक का सफाया किया था और क्या भारत भी कुछ ऐसी कार्रवाई मसूद के खिलाफ कर पाएगा?
तो चलिए आज जानते है इतिहास के सबसे बड़े ऑपरेशन की कहानी और समझते हैं भारत की ताकत-
अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुआ था आत्मघाती आतंकी हमला. इतिहास में ये सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक है. इस हमले में 2996 लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग जख्मी हो गए थे. इस हमले की जिम्मेदारी अलकायदा के आका ओसामा बिन लादेन ने ली थी. इतने बड़े आतंकी हमले के बाद अमेरिका पूरी तरह हिल गया और बदले की भावना उसके अंदर धधकने लगी. तब शुरू हुआ अमेरिका की खुफिया एजेंसियों का सबसे बड़ा ऑपरेशन.
2001 में हमले के बाद से ही ओसामा बिन लादेन फरार हो गया. पहले वो अफगानिस्तान गया, फिर वहां से तोरा बोरा की पहाड़ियों में अपना ठिकाना बना लिया. 9 साल तक ओसामा इसी तरीके से अमेरिकी एजेंसियों की आंख में धूल झोंकता रहा. वो पाकिस्तान के किसी गांव में छिपकर अपनी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा. लेकिन साल 2010 में अमेरिकी एजेंसी के हाथ लगा ओसामा का सबसे भरोसेमंद संदेशवाहक, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने इस मिशन को सफतापूर्वक पूरा किया. बता दें, काफी लंबे समय तक कुछ पाकिस्तानी लोग अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए काम कर रहे थे. उन्हीं लोगों ने जुलाई 2010 में ओसामा के उस संदेशवाहक को पेशावर में वाइट सुजूकी गाड़ी में देखा था. ये जानकारी मिलते ही अमेरिकी एजेंसी एक्शन में आ गई और उन्होंने काफी लंबे समय तक उस व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखी. उस संदेशवाहक का पीछा करते-करते एजेंसियां आ पहुंची एबटाबाद जहां ओसामा बिन लादेन के छिप कर रहने की पुष्टि हुई थी.
अब यहां से शुरू हुआ ऑपरेशऩ नेपट्यून स्पीर और अमेरिका के नेवी सील के कमांडो निकल पड़े ओसामा के खात्मे के लिए.
कैसे हुआ था ये ऑपरेशन
1. अमेरिका के 79 हेलिकॉप्टर अफगानिस्तान के जलालाबाद इलाके से निकल पड़े.
2. रात के एक बजे पहुंचे नेवी सील के कमांडो एब्टाबाद. वहां उनका एक हेलिकॉप्टर उम्मीद से जल्दी नीचे उतर गया और उसका पिछला भाग एक दीवार से टकरा गया. लेकिन इस घटना में कोई जख्मी नहीं हुआ और ऑपरेशन रणनीति के मुताबिक आगे बढ़ा.
3. तभी उन कमांडो पर गेस्टहाउस के पीछे के दरवाजे से गोलीबारी शुरू हो गई. पता चला ये गोलियां ओसामा का संदेशवाहक अबू अहमद कुवेती दाग रहा था. कमांडो ने तुरंत ही उसे मार गिराया. इस घटना में अबू की पत्नी भी मारी गई.
4. इसके बाद वे कमांडो गेस्टहाउस का मुख्य द्वार उड़ा देते हैं और पहली मंजिल की तरफ कूच करते हैं. वहां पहुंचते ही वे संदेशवाहक के भाई को भी मार गिरा देते हैं.
5. ऑपरेशन आगे बढ़ता है और ओसामा का बेटा खालिद भी मारा जाता है. उसका बेटा जैसे ही नेवी सील की तरफ हमला करने की कोशिश करता है, कमांडो उसको मौत के घाट उतार देते हैं.
6. अब ऑपरेशन अपने अंतिम चरण पर पहुंचता है और ओसामा को मारने के लिए कूच करता है. सील नेवी के कमांडो जैसे ही तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं, उन्हें ओसामा अपने हाथ में एके-47 लेकर खड़ा दिखता है. उसी समय सील नेवी उस दहशतगर्द को तुरंत मार गिराती है. बता दें, ओसामा की बाएं आंख और छाती पर गोलियों से वार किया गया और उसने तुरंत ही दम तोड़ दिया.
7. इसके बाद ओसामा की तस्वीर भी खींची गई और अमेरिकी अधिकारियों को भेज दी गई. 12 घंटे के भीतर ही ओसामा बिन लादेन की बॉडी को ठिकाने लगा दिया गया. बता दें उसकी बॉडी को उत्तरी अरेबियन समुद्र में फेक दिया गया.
तो इस तरीके से अमेरिका ने अपना 9/11 का बदला पूरा किया और अलकायदा का हुक्मरान ओसामा बिन लादेन मारा गया. अब वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद ये उम्मीद तो जग गई है कि भारत भी कुछ इसी तरीके की कार्रवाई कर सकता है. वैसे भारत की खुफिया एजेंसी बहुत सक्रिय है और इस तरीके का काम करने की क्षमता भी रखती है. बता दें, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( ISRO) भी पाकिस्तान के 87 फीसदी क्षेत्रफल पर अपनी पैनी नजर बनाकर रखती है और हमारी एजेंसियों को HD क्वालिटी की तस्वीरें भेजती रहती है. यही नहीं हमारी वायुसेना ने तो अपना पराक्रम दिखा ही दिया है. उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे कम समय में सटीक निशाना लगा सकते हैं. बता दें, जो मिराज 2000 भारतीय वायुसेना ने एयर स्ट्राइक में प्रयोग किए थे, वे अत्यंत ही शक्तिशाली विमान है. मिराज एक बार में 13,800 किलो बारूद के साथ 2000 प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है. वैसे 2015 में ये विमान अपग्रेड भी हो चुके हैं. इसके अलावा भारतीय वायुसेना के पास मिग 21, मिग 27 और जगुआर जैसे धासू एयरक्राफ्ट हैं. भारत लगातार अपने रडार सिस्टम को भी मजबूत कर रहा है. वायुसेना के अलावा भारतीय आर्मी और नौसेना बहुत सशक्त है और किसी भी प्रकार का हमला करने के लिए हमेशा तैयार है. इस समय पाकिस्तान की बौखलाहट का यही मतलब है कि वो जानता है कि उसकी सैन्य शक्ति भारत के सामने नही टिक सकती है.
तो मतलब साफ है, भारत के पास तकनीक भी है और सैन्य बल भी. अब अगर सरकार की तरफ से मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई जाए तो भारत भी जैश के हुक्मरान मसूद अजहर का सफाया कर सकती है.
तो चलिए आज जानते है इतिहास के सबसे बड़े ऑपरेशन की कहानी और समझते हैं भारत की ताकत-
अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुआ था आत्मघाती आतंकी हमला. इतिहास में ये सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक है. इस हमले में 2996 लोगों की मौत हुई थी और बड़ी संख्या में लोग जख्मी हो गए थे. इस हमले की जिम्मेदारी अलकायदा के आका ओसामा बिन लादेन ने ली थी. इतने बड़े आतंकी हमले के बाद अमेरिका पूरी तरह हिल गया और बदले की भावना उसके अंदर धधकने लगी. तब शुरू हुआ अमेरिका की खुफिया एजेंसियों का सबसे बड़ा ऑपरेशन.
2001 में हमले के बाद से ही ओसामा बिन लादेन फरार हो गया. पहले वो अफगानिस्तान गया, फिर वहां से तोरा बोरा की पहाड़ियों में अपना ठिकाना बना लिया. 9 साल तक ओसामा इसी तरीके से अमेरिकी एजेंसियों की आंख में धूल झोंकता रहा. वो पाकिस्तान के किसी गांव में छिपकर अपनी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा. लेकिन साल 2010 में अमेरिकी एजेंसी के हाथ लगा ओसामा का सबसे भरोसेमंद संदेशवाहक, जिसके माध्यम से उन्होंने अपने इस मिशन को सफतापूर्वक पूरा किया. बता दें, काफी लंबे समय तक कुछ पाकिस्तानी लोग अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए काम कर रहे थे. उन्हीं लोगों ने जुलाई 2010 में ओसामा के उस संदेशवाहक को पेशावर में वाइट सुजूकी गाड़ी में देखा था. ये जानकारी मिलते ही अमेरिकी एजेंसी एक्शन में आ गई और उन्होंने काफी लंबे समय तक उस व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखी. उस संदेशवाहक का पीछा करते-करते एजेंसियां आ पहुंची एबटाबाद जहां ओसामा बिन लादेन के छिप कर रहने की पुष्टि हुई थी.
अब यहां से शुरू हुआ ऑपरेशऩ नेपट्यून स्पीर और अमेरिका के नेवी सील के कमांडो निकल पड़े ओसामा के खात्मे के लिए.
कैसे हुआ था ये ऑपरेशन
1. अमेरिका के 79 हेलिकॉप्टर अफगानिस्तान के जलालाबाद इलाके से निकल पड़े.
2. रात के एक बजे पहुंचे नेवी सील के कमांडो एब्टाबाद. वहां उनका एक हेलिकॉप्टर उम्मीद से जल्दी नीचे उतर गया और उसका पिछला भाग एक दीवार से टकरा गया. लेकिन इस घटना में कोई जख्मी नहीं हुआ और ऑपरेशन रणनीति के मुताबिक आगे बढ़ा.
3. तभी उन कमांडो पर गेस्टहाउस के पीछे के दरवाजे से गोलीबारी शुरू हो गई. पता चला ये गोलियां ओसामा का संदेशवाहक अबू अहमद कुवेती दाग रहा था. कमांडो ने तुरंत ही उसे मार गिराया. इस घटना में अबू की पत्नी भी मारी गई.
4. इसके बाद वे कमांडो गेस्टहाउस का मुख्य द्वार उड़ा देते हैं और पहली मंजिल की तरफ कूच करते हैं. वहां पहुंचते ही वे संदेशवाहक के भाई को भी मार गिरा देते हैं.
5. ऑपरेशन आगे बढ़ता है और ओसामा का बेटा खालिद भी मारा जाता है. उसका बेटा जैसे ही नेवी सील की तरफ हमला करने की कोशिश करता है, कमांडो उसको मौत के घाट उतार देते हैं.
6. अब ऑपरेशन अपने अंतिम चरण पर पहुंचता है और ओसामा को मारने के लिए कूच करता है. सील नेवी के कमांडो जैसे ही तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं, उन्हें ओसामा अपने हाथ में एके-47 लेकर खड़ा दिखता है. उसी समय सील नेवी उस दहशतगर्द को तुरंत मार गिराती है. बता दें, ओसामा की बाएं आंख और छाती पर गोलियों से वार किया गया और उसने तुरंत ही दम तोड़ दिया.
7. इसके बाद ओसामा की तस्वीर भी खींची गई और अमेरिकी अधिकारियों को भेज दी गई. 12 घंटे के भीतर ही ओसामा बिन लादेन की बॉडी को ठिकाने लगा दिया गया. बता दें उसकी बॉडी को उत्तरी अरेबियन समुद्र में फेक दिया गया.
तो इस तरीके से अमेरिका ने अपना 9/11 का बदला पूरा किया और अलकायदा का हुक्मरान ओसामा बिन लादेन मारा गया. अब वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के बाद ये उम्मीद तो जग गई है कि भारत भी कुछ इसी तरीके की कार्रवाई कर सकता है. वैसे भारत की खुफिया एजेंसी बहुत सक्रिय है और इस तरीके का काम करने की क्षमता भी रखती है. बता दें, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ( ISRO) भी पाकिस्तान के 87 फीसदी क्षेत्रफल पर अपनी पैनी नजर बनाकर रखती है और हमारी एजेंसियों को HD क्वालिटी की तस्वीरें भेजती रहती है. यही नहीं हमारी वायुसेना ने तो अपना पराक्रम दिखा ही दिया है. उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे कम समय में सटीक निशाना लगा सकते हैं. बता दें, जो मिराज 2000 भारतीय वायुसेना ने एयर स्ट्राइक में प्रयोग किए थे, वे अत्यंत ही शक्तिशाली विमान है. मिराज एक बार में 13,800 किलो बारूद के साथ 2000 प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ सकता है. वैसे 2015 में ये विमान अपग्रेड भी हो चुके हैं. इसके अलावा भारतीय वायुसेना के पास मिग 21, मिग 27 और जगुआर जैसे धासू एयरक्राफ्ट हैं. भारत लगातार अपने रडार सिस्टम को भी मजबूत कर रहा है. वायुसेना के अलावा भारतीय आर्मी और नौसेना बहुत सशक्त है और किसी भी प्रकार का हमला करने के लिए हमेशा तैयार है. इस समय पाकिस्तान की बौखलाहट का यही मतलब है कि वो जानता है कि उसकी सैन्य शक्ति भारत के सामने नही टिक सकती है.
तो मतलब साफ है, भारत के पास तकनीक भी है और सैन्य बल भी. अब अगर सरकार की तरफ से मजबूत इच्छाशक्ति दिखाई जाए तो भारत भी जैश के हुक्मरान मसूद अजहर का सफाया कर सकती है.
Wednesday, January 30, 2019
32-inch की स्मार्ट LED TV 4,999 रु. में, जानिए 10 बड़ी बातें
भारतीय स्टार्टअप Samy Informatics ने भारत 32 इंच की स्मार्ट एलईडी टीवी लॉन्च की है. इसकी कीमत ही इसकी खासियत है. 4,999 रुपये इसकी कीमत है, लेकिन आपको जीएसटी और डिलीवरी चार्ज अलग से देने होंगे. हमने इस कंपनी के फाउंडर डायरेक्टर अविनश मेहता से खास बातचीत की है. यहां 10 प्वॉइंट्स में आप इस टीवी के बारे में सब कुछ जान सकते हैं.
1. अविनाश कुमार कहते हैं, ‘आप इसे बिना आधार के नहीं खरीद सकते हैं और इसे खरीदने के लिए आपको ऐप डाउनलोड करना होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमने पाया है कि लोग इसे खरीदकर डिस्मेंटल करके इसका पार्ट्स बेच देते हैं’
2. यह टीवी आपके घर तक डिलिवर होगा और यह ऑफलाइन नहीं मिलेगा. कंपनी के डायरेक्टर ने कहा है कि यह पूरी तरह से कैश ऑन डिलिवरी है. यानी आपके घर पर टीवी इंस्टॉल कर दिया जाएगा तब ही इसके लिए आपको पैसे देने हैं.
3. यह कंपनी लगभग तीन साल से मार्केट में है और दूसरी टीवी बेच रही है. अब 32 इंच का टीवी पेश किया गया है.
4. अविनाश कुमार ने बताया है कि कंपनी टीवी में दिखाए गए विज्ञापन से पैसे कमाती है. टीवी ऑन करने पर आपको कुछ प्रचार दिखेंगे. हालांकि आप इन्हें स्किप भी कर सकेंगे.
5. कंपनी के मुताबिक इसके साथ तीन साल की वॉरंटी मिलती है. ये ऑनसाइट वॉरंटी है और एक साल तक सर्विस फ्री होगी. अगले दो साल टीवी सर्विस के पैसे लिए जाएंगे. इसे आपको कहीं ले जाने की जरूरत नहीं होगी.
6. हमने अविनाश कुमार से रिंगिंग बेल्स द्वारा किए गए Freedom 251 के फ्रॉड के बारे में पूछा. उन्होंने कहा है, ‘हम मार्केट में 2 साल से टीवी बेच रहे हैं. कस्टमर्स फीडबैक भी देते हैं. हमारे पेज पर टीवी के साथ कस्टमर्स की फोटो भी है. हम टीवी बेचते वक्त कस्टमर्स से पूछकर टीवी के साथ उनकी तस्वीर लेते हैं और उसे अपने पेज पर अपडेट करते हैं. अगर कस्टमर्स चाहते हैं तो हम उनका कॉन्टैक्ट भी डालते हैं’
7. यह टीवी फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व बेसिस पर मिलेगी. कंपनी के मुताबिक लिमिटेड स्टॉक होने की वजह से जो पहले बुक करेगा उसे पहले टीवी मिलेगा. कंपनी के को-फाउंडर ने यह भी कहा है कि वो दो साल पहले मीडिया में इसलिए नहीं आए थे, क्योंकि लोगों को लगेगा कि ये फ्रॉड कर रहे हैं और 2 साल तक टीवी की बिक्री करते रहें ह. इस बार नया टीवी वेरिएंट लॉन्च किया गया है.
8. 32 इंच की इस टीवी में 512MB रैम और 4GB की इंटर्नल स्टोरेज दी गई है. साउंड आउटपाउट 20W का है और इसमें SRS Dolby Digital भी है. दूसरे स्मार्ट टीवी की तरह ही इसे भी आप अपने स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं.
9. इस टीवी में 2 यूएसबी पोर्ट, दो एचडीएमआई पोर्ट और वीजीए पोर्ट दिए गए हैं. इसे आप एचडीएमआई केबल से कनेक्ट करके भी स्क्रीन कास्ट कर सकते हैं.
10. इस टीवी को खरीदने के लिए जिस ऐप की जरूरत है वो अभी सिर्फ गूगल प्ले स्टोर पर ही उपलब्ध है.
1. अविनाश कुमार कहते हैं, ‘आप इसे बिना आधार के नहीं खरीद सकते हैं और इसे खरीदने के लिए आपको ऐप डाउनलोड करना होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमने पाया है कि लोग इसे खरीदकर डिस्मेंटल करके इसका पार्ट्स बेच देते हैं’
2. यह टीवी आपके घर तक डिलिवर होगा और यह ऑफलाइन नहीं मिलेगा. कंपनी के डायरेक्टर ने कहा है कि यह पूरी तरह से कैश ऑन डिलिवरी है. यानी आपके घर पर टीवी इंस्टॉल कर दिया जाएगा तब ही इसके लिए आपको पैसे देने हैं.
3. यह कंपनी लगभग तीन साल से मार्केट में है और दूसरी टीवी बेच रही है. अब 32 इंच का टीवी पेश किया गया है.
4. अविनाश कुमार ने बताया है कि कंपनी टीवी में दिखाए गए विज्ञापन से पैसे कमाती है. टीवी ऑन करने पर आपको कुछ प्रचार दिखेंगे. हालांकि आप इन्हें स्किप भी कर सकेंगे.
5. कंपनी के मुताबिक इसके साथ तीन साल की वॉरंटी मिलती है. ये ऑनसाइट वॉरंटी है और एक साल तक सर्विस फ्री होगी. अगले दो साल टीवी सर्विस के पैसे लिए जाएंगे. इसे आपको कहीं ले जाने की जरूरत नहीं होगी.
6. हमने अविनाश कुमार से रिंगिंग बेल्स द्वारा किए गए Freedom 251 के फ्रॉड के बारे में पूछा. उन्होंने कहा है, ‘हम मार्केट में 2 साल से टीवी बेच रहे हैं. कस्टमर्स फीडबैक भी देते हैं. हमारे पेज पर टीवी के साथ कस्टमर्स की फोटो भी है. हम टीवी बेचते वक्त कस्टमर्स से पूछकर टीवी के साथ उनकी तस्वीर लेते हैं और उसे अपने पेज पर अपडेट करते हैं. अगर कस्टमर्स चाहते हैं तो हम उनका कॉन्टैक्ट भी डालते हैं’
7. यह टीवी फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व बेसिस पर मिलेगी. कंपनी के मुताबिक लिमिटेड स्टॉक होने की वजह से जो पहले बुक करेगा उसे पहले टीवी मिलेगा. कंपनी के को-फाउंडर ने यह भी कहा है कि वो दो साल पहले मीडिया में इसलिए नहीं आए थे, क्योंकि लोगों को लगेगा कि ये फ्रॉड कर रहे हैं और 2 साल तक टीवी की बिक्री करते रहें ह. इस बार नया टीवी वेरिएंट लॉन्च किया गया है.
8. 32 इंच की इस टीवी में 512MB रैम और 4GB की इंटर्नल स्टोरेज दी गई है. साउंड आउटपाउट 20W का है और इसमें SRS Dolby Digital भी है. दूसरे स्मार्ट टीवी की तरह ही इसे भी आप अपने स्मार्टफोन से कनेक्ट कर सकते हैं.
9. इस टीवी में 2 यूएसबी पोर्ट, दो एचडीएमआई पोर्ट और वीजीए पोर्ट दिए गए हैं. इसे आप एचडीएमआई केबल से कनेक्ट करके भी स्क्रीन कास्ट कर सकते हैं.
10. इस टीवी को खरीदने के लिए जिस ऐप की जरूरत है वो अभी सिर्फ गूगल प्ले स्टोर पर ही उपलब्ध है.
Tuesday, January 22, 2019
कमलनाथ का आरोप- MP में ऑपरेशन लोटस में लगी BJP, 5 विधायकों को दिए ऑफर
कर्नाटक के बाद अब मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर अपनी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया है. कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी मध्य प्रदेश में 'ऑपरेशन लोटस' चलाने का प्रयास कर रही है. कांग्रेस के पांच विधायकों ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को बताया है कि बीजेपी ने उनसे संपर्क साधा है और उन्हें तोड़ने के लिए प्रलोभन दिया जा रहा है ताकि कांग्रेस सरकार को संकट में डाला जा सके. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि बीजेपी उनकी सरकार को गिराने की कोशिश कर रही है.
कमलनाथ ने 'इंडिया टुडे' से बातचीत में कहा, 'बीजेपी मध्य प्रदेश में ऑपरेशन लोटस का प्रयास कर रही है.' उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पांच विधायकों से बीजेपी ने संपर्क कर प्रलोभन देने का प्रयास किया था. इसकी जानकारी इन विधायकों ने अपने मुख्यमंत्री को दी है. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बीजेपी कांग्रेसी विधायकों को प्रलोभन देकर उन्हें तोड़ने की कोशिश कर रही है ताकि उनकी सरकार को गिराया जा सके.
कमलनाथ ने हालांकि अपने सरकार के प्रति भरोसा जताया है और कहा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है. उन्होंने यह भी दावा किया कि बीजेपी के पांच विधायक उनके संपर्क में हैं. बीजेपी के ये विधायक अपनी पार्टी में अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं. कमलनाथ ने कहा कि यदि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती है तो वह भी वही करेंगे.
कर्नाटक का संकट
बता दें कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर उस समय संकट के बादल मंडराने लगे थे, जब दो विधायकों ने सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की थी. इसके बाद सवाल उठने लगे थे कि सात महीने पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी की सरकार क्या चल पाएगी. असल में, कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायकों के मुंबई में बीजेपी नेताओं के संपर्क में होने की सुर्खियों के बाद कयासबाजी का दौर शुरू हो गया था और कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार को लेकर सवाल उठने लगे थे. कहा जाने लगा था कि बीजेपी कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस चला रही है जिसके तहत वह कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों को तोड़कर अपना सरकार बनाना चाहती है. वहीं एचडी कुमारस्वामी को सामने आना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है.
मंगलवार को पत्रकारों से बात करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कथित हैकर चेहरा ढंककर आया था. हैकर ने ना तो कोई सबूत दिए और न ही पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए.
इस पूरे मामले में कांग्रेस को घेरते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हैकिंग के पीछे कांग्रेस का हाथ है.
रविशंकर प्रसाद ने सवाल किया, ''किस हैसियत से कपिल सिब्बल वहां मौजूद थे. मेरा मानना है कि कपिल सिब्बल वहां कांग्रेस की तरफ़ से बैठे थे. सिब्बल कांग्रेस की तरफ़ से पूरे मामले की मॉनिटरिंग करने गए थे.''
सोमवार को लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम में सैय्यद शुजा नामक कथित हैकर ने भारत में चुनावों में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम को हैक करने का दावा किया था. इस कार्यक्रम को यूरोप में स्थित इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन की ओर से आयोजित किया गया था.
कमलनाथ ने 'इंडिया टुडे' से बातचीत में कहा, 'बीजेपी मध्य प्रदेश में ऑपरेशन लोटस का प्रयास कर रही है.' उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पांच विधायकों से बीजेपी ने संपर्क कर प्रलोभन देने का प्रयास किया था. इसकी जानकारी इन विधायकों ने अपने मुख्यमंत्री को दी है. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि बीजेपी कांग्रेसी विधायकों को प्रलोभन देकर उन्हें तोड़ने की कोशिश कर रही है ताकि उनकी सरकार को गिराया जा सके.
कमलनाथ ने हालांकि अपने सरकार के प्रति भरोसा जताया है और कहा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है. उन्होंने यह भी दावा किया कि बीजेपी के पांच विधायक उनके संपर्क में हैं. बीजेपी के ये विधायक अपनी पार्टी में अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं. कमलनाथ ने कहा कि यदि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती है तो वह भी वही करेंगे.
कर्नाटक का संकट
बता दें कि कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार पर उस समय संकट के बादल मंडराने लगे थे, जब दो विधायकों ने सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा की थी. इसके बाद सवाल उठने लगे थे कि सात महीने पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी की सरकार क्या चल पाएगी. असल में, कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायकों के मुंबई में बीजेपी नेताओं के संपर्क में होने की सुर्खियों के बाद कयासबाजी का दौर शुरू हो गया था और कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार को लेकर सवाल उठने लगे थे. कहा जाने लगा था कि बीजेपी कर्नाटक में ऑपरेशन लोटस चला रही है जिसके तहत वह कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों को तोड़कर अपना सरकार बनाना चाहती है. वहीं एचडी कुमारस्वामी को सामने आना पड़ा और यह कहना पड़ा कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है.
मंगलवार को पत्रकारों से बात करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कथित हैकर चेहरा ढंककर आया था. हैकर ने ना तो कोई सबूत दिए और न ही पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए.
इस पूरे मामले में कांग्रेस को घेरते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हैकिंग के पीछे कांग्रेस का हाथ है.
रविशंकर प्रसाद ने सवाल किया, ''किस हैसियत से कपिल सिब्बल वहां मौजूद थे. मेरा मानना है कि कपिल सिब्बल वहां कांग्रेस की तरफ़ से बैठे थे. सिब्बल कांग्रेस की तरफ़ से पूरे मामले की मॉनिटरिंग करने गए थे.''
सोमवार को लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम में सैय्यद शुजा नामक कथित हैकर ने भारत में चुनावों में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम को हैक करने का दावा किया था. इस कार्यक्रम को यूरोप में स्थित इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन की ओर से आयोजित किया गया था.
Thursday, January 10, 2019
कांग्रेस की हिना कांवरे उपाध्यक्ष बनीं; भाजपा ने कहा- चयन प्रक्रिया अलोकतांत्रिक, हम कोर्ट जाएंगे
मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने गुरुवार को कांग्रेस विधायक हिना कांवरे को उपाध्यक्ष घोषित किया। भाजपा की ओर से इस पद के लिए विधायक जगदीश देवड़ा के नाम का प्रस्ताव रखा गया था। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए वोटिंग नहीं कराई गई। यह चयन प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है। हम फैसले को कोर्ट मेें चुनौती देंगे। हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही दो बार स्थगित करनी पड़ी।
भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष पर पक्षपात का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। हंगामे की बीच सरकार ने 22 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट पास कर दिया। इसके बाद विधानसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई।
हिना के पक्ष में 4 प्रस्ताव दिए गए
विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में मंगलवार को जो पैटर्न प्रोटेम स्पीकर ने अपनाया था, उसे ही विधानसभा अध्यक्ष ने उपाध्यक्ष चुनाव में आगे बढ़ाया। कांग्रेस की ओर से हिना कांवरे के पक्ष में पहले चार प्रस्ताव दिए गए। भाजपा के जगदीश देवड़ा के पक्ष में प्रस्ताव पांचवां था। विधानसभा अध्यक्ष ने पहले आए प्रस्तावों को पास करते हुए हिना कांवरे को उपाध्यक्ष घोषित किया। हिना को हाल में ही कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनाया गया था।
सवर्ण आरक्षण बिल पर बोल रहे थे शिवराज, अध्यक्ष ने रोक दिया
सदन की कार्यवाही शुरू होने पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यसभा में पारित हुए सामान्य वर्ग के आरक्षण बिल पर धन्यवाद ज्ञापित करना शुरू कर दिया। इस पर सत्ता पक्ष के विधायकों ने हंगामा कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष ने शिवराज सिंह से कहा कि आप बिना अनुमति के कुछ नहीं बोल सकते। इस पर विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया।
इससे पहले कांग्रेस विधायकों ने शिवराज सिंह की बैठने की जगह पर भी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने अध्यक्ष से कहा कि शिवराज नेता प्रतिपक्ष की जगह पर बैठे थे और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव उनकी बगल में बैठे हुए थे। कांग्रेस विधायकों के हंगामे के बाद दोनों ने अपनी जगह बदली।
जिले में एक अनोखा मामला सामने आया है। विजयनगर पुलिस ने बिजली चोरी के आरोप में फरार 95 साल के एक बुजुर्ग किसान को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया है। बुजुर्ग को पेशी के लिए उनका बेटा गोद में उठाकर लाया है। देखने वाले पुलिस की इस गिरफ्तारी पर हैरान हैं। हालांकि कोर्ट ने किसान की उम्र देखते हुए उन्हें तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया। पुलिस ने उन्हें 2014 से फरार घोषित कर रखा था।
मामला सोमवार का है, हैरानी इस बात पर है कि 95 साल के नन्नुलाल किसी की मदद के बगैर हिल तक नहीं पाते। उन्हें फरार घोषित कर 5 साल बाद कोर्ट में पेश किया गया। जबकि वह 19 साल पहले ही बिस्तर पकड़ चुके हैं। ऐसे नन्नुलाल यादव के ऊपर चोरी के आरोप लगाए गए, जो दवा के सहारे जिंदगी काट रहा है। कोर्ट में पेशी के बाद ही उसके बेटे ने बुजुर्ग को दवा दी।
बुजुर्ग पर बिजली चोरी का आरोप
मामला विजयपुर थाना इलाके के कनारी गांव का है। जहां पर 95 साल के नन्नुलाल यादव कई साल के खेती किसानी करते हैं, वहीं उनका परिवार भी रहता है। करीब 15 साल से बीमारी और बढ़ती उम्र के कारण नन्नुलाल चलने-फिरने में असमर्थ हो गए और बिस्तर पकड़ लिया। इसके बावजूद 2014 में पुलिस ने नन्नुलाल यादव पर चोरी की बिजली से सिंचाई करने का मामला दर्ज किया। नन्नुलाल पर आरोप है कि उन्होंने अपने तीन बीघा खेत में चोरी की बिजली से पानी की मोटर का इस्तेमाल कर सिंचाई की है।
कोर्ट के दबाव में पुलिस ने कर दी पेशी : कोर्ट ने बिजली चोरी का मामला लंबा खिंचने पर पुलिस पर दबाव बनाया तो पुलिस ने आरोपी किसान नन्नुलाल यादव की गिरफ्तारी दिखा दी और कोर्ट ले आए। बिजली प्रकरणों की सुनावाई के लिए कोर्ट ने नन्नुलाल को नोटिस जारी किया था तब पुलिस ने लापरवाही बरतते हुए उन्हें फरार बताया था, जिसके बाद कोर्ट ने उनके खिलाफ स्थाई नोटिस जारी कर दिया।
भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष पर पक्षपात का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। हंगामे की बीच सरकार ने 22 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट पास कर दिया। इसके बाद विधानसभा की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई।
हिना के पक्ष में 4 प्रस्ताव दिए गए
विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव में मंगलवार को जो पैटर्न प्रोटेम स्पीकर ने अपनाया था, उसे ही विधानसभा अध्यक्ष ने उपाध्यक्ष चुनाव में आगे बढ़ाया। कांग्रेस की ओर से हिना कांवरे के पक्ष में पहले चार प्रस्ताव दिए गए। भाजपा के जगदीश देवड़ा के पक्ष में प्रस्ताव पांचवां था। विधानसभा अध्यक्ष ने पहले आए प्रस्तावों को पास करते हुए हिना कांवरे को उपाध्यक्ष घोषित किया। हिना को हाल में ही कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनाया गया था।
सवर्ण आरक्षण बिल पर बोल रहे थे शिवराज, अध्यक्ष ने रोक दिया
सदन की कार्यवाही शुरू होने पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यसभा में पारित हुए सामान्य वर्ग के आरक्षण बिल पर धन्यवाद ज्ञापित करना शुरू कर दिया। इस पर सत्ता पक्ष के विधायकों ने हंगामा कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष ने शिवराज सिंह से कहा कि आप बिना अनुमति के कुछ नहीं बोल सकते। इस पर विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया।
इससे पहले कांग्रेस विधायकों ने शिवराज सिंह की बैठने की जगह पर भी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने अध्यक्ष से कहा कि शिवराज नेता प्रतिपक्ष की जगह पर बैठे थे और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव उनकी बगल में बैठे हुए थे। कांग्रेस विधायकों के हंगामे के बाद दोनों ने अपनी जगह बदली।
जिले में एक अनोखा मामला सामने आया है। विजयनगर पुलिस ने बिजली चोरी के आरोप में फरार 95 साल के एक बुजुर्ग किसान को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया है। बुजुर्ग को पेशी के लिए उनका बेटा गोद में उठाकर लाया है। देखने वाले पुलिस की इस गिरफ्तारी पर हैरान हैं। हालांकि कोर्ट ने किसान की उम्र देखते हुए उन्हें तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया। पुलिस ने उन्हें 2014 से फरार घोषित कर रखा था।
मामला सोमवार का है, हैरानी इस बात पर है कि 95 साल के नन्नुलाल किसी की मदद के बगैर हिल तक नहीं पाते। उन्हें फरार घोषित कर 5 साल बाद कोर्ट में पेश किया गया। जबकि वह 19 साल पहले ही बिस्तर पकड़ चुके हैं। ऐसे नन्नुलाल यादव के ऊपर चोरी के आरोप लगाए गए, जो दवा के सहारे जिंदगी काट रहा है। कोर्ट में पेशी के बाद ही उसके बेटे ने बुजुर्ग को दवा दी।
बुजुर्ग पर बिजली चोरी का आरोप
मामला विजयपुर थाना इलाके के कनारी गांव का है। जहां पर 95 साल के नन्नुलाल यादव कई साल के खेती किसानी करते हैं, वहीं उनका परिवार भी रहता है। करीब 15 साल से बीमारी और बढ़ती उम्र के कारण नन्नुलाल चलने-फिरने में असमर्थ हो गए और बिस्तर पकड़ लिया। इसके बावजूद 2014 में पुलिस ने नन्नुलाल यादव पर चोरी की बिजली से सिंचाई करने का मामला दर्ज किया। नन्नुलाल पर आरोप है कि उन्होंने अपने तीन बीघा खेत में चोरी की बिजली से पानी की मोटर का इस्तेमाल कर सिंचाई की है।
कोर्ट के दबाव में पुलिस ने कर दी पेशी : कोर्ट ने बिजली चोरी का मामला लंबा खिंचने पर पुलिस पर दबाव बनाया तो पुलिस ने आरोपी किसान नन्नुलाल यादव की गिरफ्तारी दिखा दी और कोर्ट ले आए। बिजली प्रकरणों की सुनावाई के लिए कोर्ट ने नन्नुलाल को नोटिस जारी किया था तब पुलिस ने लापरवाही बरतते हुए उन्हें फरार बताया था, जिसके बाद कोर्ट ने उनके खिलाफ स्थाई नोटिस जारी कर दिया।
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