श्रीलंका में 21 अप्रैल को हुए चरमपंथी हमलों की चल रही जांच के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन हमलों को रोका जा सकता था. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि हमले से दो हफ़्ते पहले भारत ने इसे लेकर आगाह किया था.
भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यदि श्रीलंकाई अधिकारियों ने समय रहते भारत से मिली सूचना पर कार्रवाई की होती तो सीरियल धमाकों को रोका जा सकता था.
आतंकवाद विरोधी मामलों पर अमरीका और अन्य देशों को अक्सर सलाह देने वाली ऑस्ट्रेलिया स्थित लीडिया खलील का मानना है कि ये हमले निश्चित रूप से रोके जा सकते थे. उन्होंने कहा, "यह कई स्तरों पर हुई चूक की वजह से हुआ."
आतंकवाद विरोधी मामलों के जानकार भारतीय पत्रकार प्रवीण स्वामी ने कहा कि उनके पास वो दस्तावेज़ हैं जिनसे यह साबित होता है कि भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारियों ने अपने श्रीलंकाई समकक्षों को चर्चों और पर्यटन स्थलों में संभावित साज़िश को लेकर आगाह किया था.
सुरक्षा विशेषज्ञों को इस बात से आश्चर्य हो रहा है कि भारत से दो हफ़्ते पहले इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिलने के बावजूद ईस्टर संडे के दिन हमले होते हैं जो यह साफ़ बताता है कि श्रीलंकाई अधिकारियों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की.
श्रीलंका की सरकार ने भारत का नाम लिए बगैर यह स्वीकार किया था कि चरमपंथी हमले को लेकर एक देश ने सूचनाएं दी थीं.
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने कहा, "जिन सुरक्षा अधिकारियों को विदेशी राष्ट्र से ख़ुफ़िया जानकारी मिली थी, उन्होंने उसे मेरे साथ साझा नहीं किया."
प्रवीण स्वामी कहते हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच राजनीतिक रिश्तों में हमेशा गर्मजोशी नहीं रहने के बावजूद दोनों देशों के ख़ुफ़िया विभाग सुरक्षा से जुड़ी सूचनाएं एक दूसरे के साथ हमेशा साझा करते रहे हैं.
वो कहते हैं, "मेरे विचार में, राजनीति में तनाव के बावजूद दोनों देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच मज़बूत रिश्ते हैं. कुछ श्रीलंकाई राजनेताओं पर रॉ के गंभीर आरोपों के बावजूद दोनों के बीच संपर्क बने हुए हैं और इन्होंने साथ काम करना जारी रखा."
दिल्ली स्थित सुरक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन कहते हैं कि 1991 में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम (एलटीटीई) के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दोनों देशों के बीच ख़ुफ़िया जानकारियों को साझा करना और भी नियमित हो गया. एलटीटीई, जिसे तमिल टाइगर्स के नाम से भी जाना जाता है, को राजीव गांधी की हत्या का ज़िम्मेदार ठहराया गया था.
सरीन का मानना है कि भारत की रॉ जैसी ख़ुफ़िया एजेंसियां सुरक्षा कारणों से दूसरे देशों के साथ पूरी जानकारी कभी साझा नहीं करेगी लेकिन कार्रवाई योग्य जानकारी ज़रूर उपलब्ध कराई जाती है. लेकिन ईस्टर संडे के दिन श्रीलंका में हुए हमले के मामले में, भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने बहुत सटीक जानकारी साझा की थी.
स्वामी के मुताबिक, संभावित प्लॉट की जानकारी में कुछ संभावित संदिग्धों के नाम और पते तक का विवरण था, जिसमें से कई वास्तव में हमलावर निकले.
लिहाज़ा इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना ने सुरक्षा एजेंसी के स्तर पर बड़े बदलाव का वादा किया है.
उन्होंने कहा, "विदेशी राष्ट्र से मिली सूचना को खुद तक रखने की बड़ी चूक करने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ मैंने कड़ी कार्रवाई करने का फ़ैसला किया है."
इसके बीच श्रीलंका में मीडिया यह पूछ रहा है कि भारत को स्थानीय इस्लामिक संगठन नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) के सदस्यों की इस हमले में शामिल होने का पता कैसे चला, श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास इन हमलों का कोई सुराग़ क्यों नहीं था? वे भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों से मिली हमलों की जानकारी पर अधिकारियों की उदासीनता पर भी सवाल उठा रहे हैं.
लेकिन भारतीय एजेंसियों को श्रीलंका में संभावित हमलों और संदिग्धों के बारे में इतनी सटीक जानकारियां कैसे थी?
इसी साल श्रीलंका के एक दूर दराज के खेत में 100 किलो विस्फ़ोटक और गोला-बारूद की बरामदगी के बाद से नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) भारतीय और श्रीलंकाई एजेंसियों के रडार पर था.
स्वामी कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि यह इलाका कथित जेहादियों की ट्रेनिंग का मैदान था और यह एनटीजे देश के कुछ बौद्ध स्मारकों को उड़ाने की योजना बना रहा था.
सरीन कहते हैं कि किसी दूसरे देश के बारे में इतनी जानकारी हासिल करना ख़ुफ़िया विभाग के लिए कोई असमान्य बात नहीं है.
वो कहते हैं, "मैंने सुना है कि हाल ही में रॉ एक संदिग्ध से पूछताछ कर रहा था और उसी दौरान श्रीलंका में सीरियल धमाकों की जानकारी उसे मिली."
रॉ या कोई अन्य ख़ुफ़िया एजेंसियां अक्सर ऐसी सूचनाओं पर टिप्पणी नहीं करतीं. लेकिन यहां यह बात उल्लेखनीय है कि भारतीय और श्रीलंकाई ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच संबंध विश्वास पर आधारित है.
तो क्या श्रीलंका चरमपंथी हमले की जांच में भारत को शामिल करेगा?
सरीन का मानना है कि सहयोग तो पहले से ही हो रहा है. हालांकि वो कहते हैं कि इसके बारे में मीडिया को कभी पता नहीं चल सकेगा.
बेशक श्रीलंकाई सरकार ने विदेशी शक्तियों से मदद मांगी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि रविवार को जो हमले हुए उसमें उसकी योजना बनाने और अंजाम देने में किसी विदेशी चरमपंथी संगठन का हाथ था या नहीं.
अमरीकी एफ़बीआई इसमें सहयोग कर रही है लेकिन भारत का नाम अभी तक सामने नहीं आया है.
सरीन के मुताबिक, "भारत के पास सटीक जानकारी है और जांच में उसकी भागीदारी अपेक्षित है. यह भारत के राष्ट्रीय हित में भी है."
हाल के दिनों में कई पड़ोसी देशों के साथ भारत का ख़ुफ़िया और सुरक्षा सहयोग पहले से अधिक मज़बूत हुआ है.
नरेंद्र मोदी सरकार ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के साथ सुरक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं.
सरीन कहते हैं, "70-80 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में रहते हैं उनमें से कुछ चरमपंथ विचारधारा के साथ सलफ़ी या कट्टर मुसलमान बन जाते हैं.
Thursday, April 25, 2019
Thursday, April 11, 2019
राजस्थान का चेन्नई से मैच आज, घरेलू मैदान पर सुपरकिंग्स के खिलाफ 7 साल से अजेय
खेल डेस्क. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के 12वें संस्करण का 25वां मुकाबला गुरुवार को सवाई मान सिंह स्टेडियम पर रात 8 बजे से राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपरकिंग्स के बीच खेला जाएगा। चेन्नई की टीम 6 में से 5 मैच जीतकर अंक तालिका में शीर्ष पर है। राजस्थान के सिर्फ 2 अंक है। वह अंक तालिका में 7वें नंबर पर है।
इस संस्करण में चेन्नई और राजस्थान दूसरी बार आमने-सामने होंगे। दोनों के बीच पहला मैच 31 मार्च को एमए चिदंबरम स्टेडियम पर हुआ था। उस मैच में चेन्नई ने 8 रन से जीत हासिल की थी।
घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ राजस्थान का सक्सेस रेट 67%
राजस्थान का घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ रिकॉर्ड बेहतर है। जयपुर में दोनों के बीच अब तक 6 मैच खेले गए हैं। इनमें से अजिंक्य रहाणे के नेतृत्व वाली राजस्थान ने 4 में जीत हासिल की है, जबकि चेन्नई को सिर्फ 2 मुकाबलों में ही सफलता मिली है।
चेन्नई सुपरकिंग्स को जयपुर में राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ आखिरी जीत 10 मई 2012 को मिली थी। तब उसने सुपरकिंग्स को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से इस मैदान पर दोनों के बीच 3 मैच हुए। तीनों को राजस्थान की टीम जीतने में सफल रही।
आईपीएल में दोनों के बीच अब तक 21 मैच हुए हैं। इनमें से चेन्नई ने 13 और राजस्थान ने 8 मैच जीते हैं। दोनों के बीच आखिरी 5 मुकाबलों की बात करें तो राजस्थान 2 को जीतने में सफल रही है, जबकि 3 में उसे महेंद्र सिंह धोनी की अगुआई वाली चेन्नई से हार का सामना करना पड़ा है।
राजस्थान ने चेन्नई के खिलाफ आखिरी जीत पिछले साल 11 मई को हासिल की थी। सवाई मान सिंह स्टेडियम पर हुए उस मुकाबले में राजस्थान ने चेन्नई को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से दोनों के बीच एक मैच हुआ, जिसे चेन्नई की टीम जीतने में सफल रही।
चेन्नई के गेंदबाज इस समय शानदार गेंदबाजी कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिछले मुकाबले में कोलकाता को 108 रन पर ही रोक दिया था। तेज गेंदबाज दीपक चाहर के साथ अनुभवी हरभजन सिंह और इमरान ताहिर भी बेहतरीन गेंदबाजी कर रहे हैं।
रायडू के फॉर्म में लौटने की उम्मीद
बल्लेबाजी में अंबाती रायडू फॉर्म में लौटना चाहेंगे। उनको छोड़कर फाफ डुप्लेसिस, शेन वॉटसन शानदार फॉर्म में चल रहे हैं। डेथ ओवर्स में महेंद्र सिंह धोनी की तेज बल्लेबाजी अन्य खिलाड़ियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर रही है।
राजस्थान की बल्लेबाजी ज्यादातर जोस बटलर और अजिंक्य रहाणे पर टिकी है। युवा बल्लेबाज संजू सैमसन ने एक मैच में शतक जरूर लगाया था, लेकिन उसके बाद से वे अपने उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाए हैं। इसके अलावा स्टीव स्मिथ और बेन स्टोक्स को भी चेन्नई के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत है।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
राजस्थान रॉयल्स : अजिंक्य रहाणे (कप्तान), कृष्णप्पा गौतम, संजू सैमसन, श्रेयस गोपाल, आर्यमान बिड़ला, एस. मिधुन, प्रशांत चोपड़ा, स्टुअर्ट बिन्नी, राहुल त्रिपाठी, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ, जोस बटलर, जोफरा आर्चर, ईश सोढ़ी, धवल कुलकर्णी, महिपाल लोमरोर, जयदेव उनादकट, वरुण एरॉन, ओशेन थॉमस, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, शुभम रंजाने, मनन वोहरा, एश्टन टर्नर, रियान पराग।
इस संस्करण में चेन्नई और राजस्थान दूसरी बार आमने-सामने होंगे। दोनों के बीच पहला मैच 31 मार्च को एमए चिदंबरम स्टेडियम पर हुआ था। उस मैच में चेन्नई ने 8 रन से जीत हासिल की थी।
घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ राजस्थान का सक्सेस रेट 67%
राजस्थान का घरेलू मैदान पर चेन्नई के खिलाफ रिकॉर्ड बेहतर है। जयपुर में दोनों के बीच अब तक 6 मैच खेले गए हैं। इनमें से अजिंक्य रहाणे के नेतृत्व वाली राजस्थान ने 4 में जीत हासिल की है, जबकि चेन्नई को सिर्फ 2 मुकाबलों में ही सफलता मिली है।
चेन्नई सुपरकिंग्स को जयपुर में राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ आखिरी जीत 10 मई 2012 को मिली थी। तब उसने सुपरकिंग्स को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से इस मैदान पर दोनों के बीच 3 मैच हुए। तीनों को राजस्थान की टीम जीतने में सफल रही।
आईपीएल में दोनों के बीच अब तक 21 मैच हुए हैं। इनमें से चेन्नई ने 13 और राजस्थान ने 8 मैच जीते हैं। दोनों के बीच आखिरी 5 मुकाबलों की बात करें तो राजस्थान 2 को जीतने में सफल रही है, जबकि 3 में उसे महेंद्र सिंह धोनी की अगुआई वाली चेन्नई से हार का सामना करना पड़ा है।
राजस्थान ने चेन्नई के खिलाफ आखिरी जीत पिछले साल 11 मई को हासिल की थी। सवाई मान सिंह स्टेडियम पर हुए उस मुकाबले में राजस्थान ने चेन्नई को 4 विकेट से हराया था। उसके बाद से दोनों के बीच एक मैच हुआ, जिसे चेन्नई की टीम जीतने में सफल रही।
चेन्नई के गेंदबाज इस समय शानदार गेंदबाजी कर रहे हैं। उन्होंने अपने पिछले मुकाबले में कोलकाता को 108 रन पर ही रोक दिया था। तेज गेंदबाज दीपक चाहर के साथ अनुभवी हरभजन सिंह और इमरान ताहिर भी बेहतरीन गेंदबाजी कर रहे हैं।
रायडू के फॉर्म में लौटने की उम्मीद
बल्लेबाजी में अंबाती रायडू फॉर्म में लौटना चाहेंगे। उनको छोड़कर फाफ डुप्लेसिस, शेन वॉटसन शानदार फॉर्म में चल रहे हैं। डेथ ओवर्स में महेंद्र सिंह धोनी की तेज बल्लेबाजी अन्य खिलाड़ियों को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित कर रही है।
राजस्थान की बल्लेबाजी ज्यादातर जोस बटलर और अजिंक्य रहाणे पर टिकी है। युवा बल्लेबाज संजू सैमसन ने एक मैच में शतक जरूर लगाया था, लेकिन उसके बाद से वे अपने उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाए हैं। इसके अलावा स्टीव स्मिथ और बेन स्टोक्स को भी चेन्नई के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन करने की जरूरत है।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
राजस्थान रॉयल्स : अजिंक्य रहाणे (कप्तान), कृष्णप्पा गौतम, संजू सैमसन, श्रेयस गोपाल, आर्यमान बिड़ला, एस. मिधुन, प्रशांत चोपड़ा, स्टुअर्ट बिन्नी, राहुल त्रिपाठी, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ, जोस बटलर, जोफरा आर्चर, ईश सोढ़ी, धवल कुलकर्णी, महिपाल लोमरोर, जयदेव उनादकट, वरुण एरॉन, ओशेन थॉमस, शशांक सिंह, लियाम लिविंगस्टोन, शुभम रंजाने, मनन वोहरा, एश्टन टर्नर, रियान पराग।
Wednesday, April 3, 2019
विपक्ष विहीन तेलंगाना! ‘भाग्य नगर’ का वादा यहां भाजपा का दुर्भाग्य न बन जाए
शशिभूषण, हैदराबाद. हैदराबाद के चारमीनार इलाके में जिससे भी पूछिए, एक ही जवाब मिलेगा- यहां तो बस एक ही है साहब। एक मतलब! असगर अली पास की मक्का मस्जिद की ओर इशारा करता है, कहता है वहीं बम फटे थे। लेकिन, वह इतिहास है। अब यह अमन का इलाका है, लोग ‘पतंग’ उड़ाते हैं। दरअसल ‘पतंग’ ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का चुनाव चिह्न है।
मध्य तेलंगाना का यह संसदीय क्षेत्र एआईएमआईएम का अजेय दुर्ग है। सीट 1984 से ओवैसी परिवार के पास है। पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी लगातार छह बार सांसद चुने गए। 2004 से बेटे असदउद्दीन ओवैसी ने विरासत संभाली। ओवैसी फिर मैदान में है। नामांकन बड़े भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी किया है। मौजम शाही मार्केट के सुलेमान आतिफ की नजर में यह एहतियाती कदम है। अकबरुद्दीन संसदीय क्षेत्र की चंद्रयानगुट्टा विधानसभा सीट से लगातार पांचवी बार विधायक हैं।
एआईएमआईएम हैदराबाद को सांप्रदायिक मेलजोल की मिसाल बताती है। विधानसभा में उसके सात विधायक हैं। अकेले छह हैदराबाद संसदीय क्षेत्र की सीटों से। सातवीं सीट घोषामहल भाजपा के पास है। विधानसभा चुनाव में यही इकलौती सीट भाजपा ने जीती थी। हैदराबाद में मुस्लिम आबादी 65% से अधिक है। भाजपा उम्मीदवार भगवंत राव 2014 में भी उम्मीदवार थे। तब उन्हें 32% वोट मिले थे। यह भाजपा का अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन था। टीआरएस ने पी. श्रीकांत को टिकट दिया है। हार्डवेयर के थोक कारोबारी सोनू की नजर में श्रीकांत की मौजूदगी ओवैसी के लिए फायदेमंद ही है।
हैदराबाद संसदीय क्षेत्र से मलकाजगिरी, सिकंदराबाद, चेलवेल्ला संसदीय क्षेत्रों की सीमा जुड़ती है। टीआरएस ने इन सीटों को प्राथमिकता में रखा है। ये सभी सीटें शहरी हैं। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के पुत्र और टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष के.तारक रामाराव (केटीआर) सीधे मॉनीटरिंग कर रहे हैं। मोदी लहर में भाजपा ने सिकंदराबाद सीट जीती थी। सांसद बंडारू दत्तात्रेय की जगह इस बार किशन रेड्डी को टिकट दिया है। रेड्डी, अंबरपेट विधानसभा सीट से महज एक हजार मतों से चुनाव हारे थे। भाजपा को सीट बचाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।
चेलवेल्ला से बी जर्नादन रेड्डी भाजपा और जी. रंजीत रेड्डी टीआरएस प्रत्याशी हैं। कांग्रेस के एस. जयपाल रेड्डी यहां से सांसद रह चुके हैं। यह आईटी हब है। के. विशेश्वर रेड्डी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। 2014 का चुनाव उन्होंने टीआरएस के टिकट पर जीता था पर विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस और टीआरएस प्रत्याशी धनाढ़य हैं। सात विधानसभा क्षेत्रों में से दो कांग्रेस के पास है। सीट पर मुकाबला कांटे का होगा।
देश की सबसे ज्यादा मतदाताओं वाली सीट (31.83 लाख) मलकाजगिरी का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता हर बार सांसद बदल देते हैं। मतदाताओं में बड़ी संख्या पूर्व सीमांध्र के लोगों की है। सांसद सी. मल्ला रेड्डी विधायक भी हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी। विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने संसदीय क्षेत्र की दो विधानसभा सीटें 70 और चार 40 हजार से अधिक के अंतर से जीती थीं।
एलबी नगर की सातवीं सीट से जीते कांग्रेस के सुधीर रेड्डी अब टीआरएस के हो गए हैं। एन रामचंद्र राव भाजपा प्रत्याशी हैं। टीआरएस ने एम राजशेखर रेड्डी को उतारा है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ए रेवंत रेड्डी को भाकपा का भी समर्थन है। रेवंत कहते हैं- यह राज्य नहीं, राष्ट्र का चुनाव है। राष्ट्र के चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका नहीं होती है। टीआरएस मुख्यालय के प्रभारी व एमएलसी प्रो. एम श्रीनिवास रेड्डी कहते है-हम न तो कांग्रेस के साथ हैं, न भाजपा के। हम फेडरल फ्रंट चाहते हैं। इसमें हमारी भूमिका होगी। सभी सीटें जीतेंगे।
टीआरएस के दावों पर भाजपा नेता बंडारू दत्तात्रेय कहते हैं, 16 सीटों पर चुनाव लड़ने वाला दल राष्ट्रीय राजनीति की बात करे, यह सबसे बड़ा मजाक है। राजनीतिक विश्लेषक डीपी सिंह के अनुसार, राज्य गठन में टीआरएस की भूमिका लोग भूले नहीं हैं। केसीआर ने हर वर्ग के लिए कारगर स्कीम चलाई हैं। लोकसभा में भी फायदा होगा। केसीआर ने राज्य को विपक्षविहीन कर दिया है। पद्मजा शॉ कहती हैं कि राज्य में लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में हो रहा है। दलबदल कानून प्रासंगिकता खो चुका है। हालात सत्ताधारी दल (राज्य) के पक्ष में हैं। समाजशास्त्री कल्पना कन्नाबीरन कहती हैं कि तेलंगाना में विपक्ष है ही नहीं। कांग्रेस कमजोर है।
भाजपा का भविष्य तो बीते विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने ही बिगाड़ दिया, जब वह हैदराबाद का नाम भाग्यनगर करने की बात कह गए थे। वैसे भी केसीआर ने भाजपा के लिए जमीन छोड़ी ही नहीं है। यज्ञ, पूजा-पाठ, तिरंगा, राष्ट्रगान केसीआर का ही एजेंडा है। द हिन्दू की पत्रकार निखिला हेनरी कहती हैं कि चुनाव में पैसे का खूब खेल होता है। इसीलिए आयोग ने राज्य को कैश सेंसेटिव सूची में भी रखा है। चुनाव में फिलहाल टीआरएस ही आगे है। दूसरी ताकत कांग्रेस है लेकिन वह विधायक खोती जा रही है।
मध्य तेलंगाना का यह संसदीय क्षेत्र एआईएमआईएम का अजेय दुर्ग है। सीट 1984 से ओवैसी परिवार के पास है। पिता सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी लगातार छह बार सांसद चुने गए। 2004 से बेटे असदउद्दीन ओवैसी ने विरासत संभाली। ओवैसी फिर मैदान में है। नामांकन बड़े भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी किया है। मौजम शाही मार्केट के सुलेमान आतिफ की नजर में यह एहतियाती कदम है। अकबरुद्दीन संसदीय क्षेत्र की चंद्रयानगुट्टा विधानसभा सीट से लगातार पांचवी बार विधायक हैं।
एआईएमआईएम हैदराबाद को सांप्रदायिक मेलजोल की मिसाल बताती है। विधानसभा में उसके सात विधायक हैं। अकेले छह हैदराबाद संसदीय क्षेत्र की सीटों से। सातवीं सीट घोषामहल भाजपा के पास है। विधानसभा चुनाव में यही इकलौती सीट भाजपा ने जीती थी। हैदराबाद में मुस्लिम आबादी 65% से अधिक है। भाजपा उम्मीदवार भगवंत राव 2014 में भी उम्मीदवार थे। तब उन्हें 32% वोट मिले थे। यह भाजपा का अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन था। टीआरएस ने पी. श्रीकांत को टिकट दिया है। हार्डवेयर के थोक कारोबारी सोनू की नजर में श्रीकांत की मौजूदगी ओवैसी के लिए फायदेमंद ही है।
हैदराबाद संसदीय क्षेत्र से मलकाजगिरी, सिकंदराबाद, चेलवेल्ला संसदीय क्षेत्रों की सीमा जुड़ती है। टीआरएस ने इन सीटों को प्राथमिकता में रखा है। ये सभी सीटें शहरी हैं। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के पुत्र और टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष के.तारक रामाराव (केटीआर) सीधे मॉनीटरिंग कर रहे हैं। मोदी लहर में भाजपा ने सिकंदराबाद सीट जीती थी। सांसद बंडारू दत्तात्रेय की जगह इस बार किशन रेड्डी को टिकट दिया है। रेड्डी, अंबरपेट विधानसभा सीट से महज एक हजार मतों से चुनाव हारे थे। भाजपा को सीट बचाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।
चेलवेल्ला से बी जर्नादन रेड्डी भाजपा और जी. रंजीत रेड्डी टीआरएस प्रत्याशी हैं। कांग्रेस के एस. जयपाल रेड्डी यहां से सांसद रह चुके हैं। यह आईटी हब है। के. विशेश्वर रेड्डी कांग्रेस प्रत्याशी हैं। 2014 का चुनाव उन्होंने टीआरएस के टिकट पर जीता था पर विधानसभा चुनाव के वक्त पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस और टीआरएस प्रत्याशी धनाढ़य हैं। सात विधानसभा क्षेत्रों में से दो कांग्रेस के पास है। सीट पर मुकाबला कांटे का होगा।
देश की सबसे ज्यादा मतदाताओं वाली सीट (31.83 लाख) मलकाजगिरी का इतिहास बताता है कि यहां मतदाता हर बार सांसद बदल देते हैं। मतदाताओं में बड़ी संख्या पूर्व सीमांध्र के लोगों की है। सांसद सी. मल्ला रेड्डी विधायक भी हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी। विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने संसदीय क्षेत्र की दो विधानसभा सीटें 70 और चार 40 हजार से अधिक के अंतर से जीती थीं।
एलबी नगर की सातवीं सीट से जीते कांग्रेस के सुधीर रेड्डी अब टीआरएस के हो गए हैं। एन रामचंद्र राव भाजपा प्रत्याशी हैं। टीआरएस ने एम राजशेखर रेड्डी को उतारा है। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष ए रेवंत रेड्डी को भाकपा का भी समर्थन है। रेवंत कहते हैं- यह राज्य नहीं, राष्ट्र का चुनाव है। राष्ट्र के चुनाव में क्षेत्रीय दलों की भूमिका नहीं होती है। टीआरएस मुख्यालय के प्रभारी व एमएलसी प्रो. एम श्रीनिवास रेड्डी कहते है-हम न तो कांग्रेस के साथ हैं, न भाजपा के। हम फेडरल फ्रंट चाहते हैं। इसमें हमारी भूमिका होगी। सभी सीटें जीतेंगे।
टीआरएस के दावों पर भाजपा नेता बंडारू दत्तात्रेय कहते हैं, 16 सीटों पर चुनाव लड़ने वाला दल राष्ट्रीय राजनीति की बात करे, यह सबसे बड़ा मजाक है। राजनीतिक विश्लेषक डीपी सिंह के अनुसार, राज्य गठन में टीआरएस की भूमिका लोग भूले नहीं हैं। केसीआर ने हर वर्ग के लिए कारगर स्कीम चलाई हैं। लोकसभा में भी फायदा होगा। केसीआर ने राज्य को विपक्षविहीन कर दिया है। पद्मजा शॉ कहती हैं कि राज्य में लोकसभा चुनाव, विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में हो रहा है। दलबदल कानून प्रासंगिकता खो चुका है। हालात सत्ताधारी दल (राज्य) के पक्ष में हैं। समाजशास्त्री कल्पना कन्नाबीरन कहती हैं कि तेलंगाना में विपक्ष है ही नहीं। कांग्रेस कमजोर है।
भाजपा का भविष्य तो बीते विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने ही बिगाड़ दिया, जब वह हैदराबाद का नाम भाग्यनगर करने की बात कह गए थे। वैसे भी केसीआर ने भाजपा के लिए जमीन छोड़ी ही नहीं है। यज्ञ, पूजा-पाठ, तिरंगा, राष्ट्रगान केसीआर का ही एजेंडा है। द हिन्दू की पत्रकार निखिला हेनरी कहती हैं कि चुनाव में पैसे का खूब खेल होता है। इसीलिए आयोग ने राज्य को कैश सेंसेटिव सूची में भी रखा है। चुनाव में फिलहाल टीआरएस ही आगे है। दूसरी ताकत कांग्रेस है लेकिन वह विधायक खोती जा रही है।
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